2032 के महाविनाश की राख से फूटता भविष्य का धर्म
मनुष्य ने अपने अहंकार, कृत्रिम उपभोक्तावाद और अंधी भक्ति के मद में इस स्वर्ग जैसी पृथ्वी को विनाश के कगार पर ला खड़ा किया है। जब भविष्य के महाविनाश का धुआं छंटेगा, तब ईश्वर किसी ईंट-पत्थर के मंदिर में नहीं, बल्कि केवल उन 165 करोड़ जीवित हृदयों में धड़केगा, जिन्हें भगवान शिव ने इस मृतप्राय सृष्टि को पुनः हरा-भरा करने के लिए चुना है।
हम सदियों तक कर्मकांडों में उलझकर मूर्तियों के सामने अपनी इच्छाओं की भीख मांगते रहे, परंतु कटते सघन वनों और बेघर होकर तड़पते मूक पक्षियों की चीखें हमने कभी नहीं सुनीं। “भविष्य का धर्म” केवल 1 पुस्तक नहीं है; यह उस मानसिक दासता और पाखंड को जड़ से उखाड़ फेंकने का अंतिम घोषणापत्र है।
यह युग-परिवर्तक ग्रंथ चीख-चीख कर कहता है कि सच्ची मुक्ति किसी पारलौकिक चमत्कार से नहीं मिलेगी। शाश्वत मुक्ति तो अपने ही भारी शरीर को अंतराल उपवास से शुद्ध कर, 75 किलोग्राम के ऊर्जावान स्वरूप में ढालने और शून्य-व्यय प्राकृतिक जीवन अपनाने में निहित है।
यह ग्रंथ 1 स्पष्ट आह्वान है कि अब कोरे उपदेशों को त्यागकर यथार्थ के धरातल पर उतरने का समय आ गया है। यह पुस्तक आपको सवाई माधोपुर, राजस्थान जैसी तपोभूमियों पर 10 एकड़ के ‘शैव ग्राम’ स्थापित करने का कठोर परंतु प्रामाणिक मार्ग दिखाती है। जब 1 मनुष्य अपने पसीने से 100000 फलदार वृक्ष लगाएगा और सर्वनाश के बाद त्राहि-त्राहि कर रहे 10000000 बेघर पक्षियों तथा वन्यजीवों को सुरक्षित आश्रय देगा, केवल तभी मानवता अपने पापों से मुक्त होगी।
आपके हाथों में जो यह दर्शन है, वह मानव जाति का अंतिम जीवन-रक्षक तंत्र है। इस पुस्तक को रेशमी वस्त्रों में लपेटकर पूजें नहीं, बल्कि इसे पढ़कर अपने हाथों में कुदाल उठा लें। क्योंकि अब दुनिया को किसी नए पंथ या मजहब की आवश्यकता नहीं है; भविष्य का धर्म केवल प्रकृति संवर्धन और मूक जीवों की निःस्वार्थ सेवा है। आइए, अंधी भक्ति को सदा के लिए त्यागकर अपने पसीने से इस पृथ्वी का श्रृंगार करें!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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