शैव समाज लोगों के एक ऐसे समूह या समुदाय को कहते हैं, जो एक साथ रहते हैं और अपनी संपत्ति, संसाधनों, आय और जिम्मेदारियों को आपस में साझा करते हैं। इस व्यवस्था में व्यक्तिगत (निजी) संपत्ति की बजाय सामूहिक संपत्ति को अधिक महत्व दिया जाता है।
शैव समाज का काम और कार्यप्रणाली मुख्य रूप से निम्नलिखित सिद्धांतों पर आधारित होता है :-
सामूहिक श्रम : शैव समाज के सभी सदस्य समुदाय के विकास और भरण-पोषण के लिए मिलकर काम करते हैं। जिससे हर व्यक्ति की हर कार्य में दक्षता विकसित होती है ! यह काम खेती, कुटीर उद्योग, या दैनिक घरेलू कार्यों से जुड़ा हो सकता है।
संसाधनों का साझाकरण: शैव समाज में जो भी आर्थिक कमाई या उत्पादन होता है, वह किसी एक व्यक्ति का नहीं होता है, बल्कि उसे सभी सदस्यों के बीच उनकी बुनियादी जरूरतों के लिये बांटा दिया जाता है।
आत्मनिर्भरता : एक शैव समाज का मुख्य कार्य अपनी बुनियादी जरूरतों जैसे भोजन, आश्रय, शिक्षा और कपड़े के लिये बाहरी दुनिया पर निर्भर होने की आवश्यकता नहीं होती है बल्कि वह अपनी अधिक से अधिक आवश्यकता स्वयं पूरा करने का प्रयास करते हैं।
सामाजिक समानता: इसमें कोई मालिक या नौकर नहीं होता है। सभी सदस्य समान होते हैं और समुदाय से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय भी अक्सर मिल-बैठकर सामूहिक रूप से ही करते हैं।
सरल शब्दों में कहें तो शैव समाज का काम “एक-दूसरे के सहयोग से, समान अधिकारों के साथ एक आत्मनिर्भर और साझा जीवन जी कर किया जाता है।“ ऐतिहासिक रूप से, साम्यवादी विचारधारा में, इजरायल के किबुत्ज में, और दुनिया भर के कई आध्यात्मिक या कृषि समुदायों में शैव समाज की व्यवस्था का सफलतापूर्वक प्रयोग किया गया है।
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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