भगवान श्री कृष्ण का ब्रह्म तत्व स्वरूप : Yogesh Mishra

कहने को तो भगवान श्री कृष्ण के विराट व्यक्तित्व का बखान करने के लिये दो ही प्रमाणिक ग्रंथ हैं, जो कि उनके समकालीन लेखक श्री वेदव्यास जी द्वारा लिखे गये थे । पहला महाभारत और दूसरा श्रीमद् भागवत पुराण ।

किंतु भगवान श्री कृष्ण के विराट ब्रह्म व्यक्तित्व को जानने के लिये तीसरे वैष्णव पुराण का अध्ययन भी करना परम आवश्यक है और वह तीसरा ग्रन्थ “ब्रह्म वैवर्त पुराण है । जो कि वेदमार्ग का दसवाँ पुराण है । जिसमें भगवान श्री कृष्ण के ब्रह्म स्वरूप का विस्तृत वर्णन किया गया है । जिसे लौकिक सांसारिक बुद्धि से नहीं समझा जा सकता है ।
ब्रह्म वैवर्त पुराण में चार खण्ड हैं । ब्रह्म खण्ड, प्रकृति खण्ड, श्रीकृष्ण जन्म खण्ड और गणेश खण्ड। इन चारों खण्डों में कुल अठारह हजार श्लोक हैं ।

‘ब्रह्मवैवर्त’ शब्द का अर्थ है कि ब्रह्म का विवर्त अर्थात् ब्रह्म के रूपान्तरित स्वरूप ‘प्रकृति की व्यवस्था का वर्णन’ । कहने का तात्पर्य है प्रकृति के भिन्न-भिन्न स्वरूप और परिणाम जहां प्रतिपादित हों वही पुराण ब्रह्मवैवर्त है । जिसके मुख्य नायक भगवान श्रीकृष्ण हैं ।

जबकि ‘ब्रह्मवैवर्त पुराण’ श्रृंगार रस से परिपूर्ण है । फिर भी इसमें सृष्टि का मूल श्रीकृष्ण को ही बतालाया गया है । इस पुराण के अनुसार विश्व में असंख्य ब्रह्माण्ड विद्यमान हैं । प्रत्येक ब्रह्माण्ड के अपने-अपने विष्णु, ब्रह्मा और महेश हैं । इन सभी ब्रह्माण्डों से भी ऊपर स्थित गोलोक में भगवान श्रीकृष्ण निवास करते हैं ।

सृष्टि निर्माण के उपरान्त सर्वप्रथम भगवान श्रीकृष्ण के अर्द्ध वाम अंग से अर्द्धनारीश्वर स्वरूप में राधा प्रकट हुईं । भगवान श्रीकृष्ण से ही ब्रह्मा, विष्णु, नारायण, धर्म, काल, महेश और प्रकृति आदि सभी की उत्पत्ति हुयी है । फिर नारायण का प्राकट्य कृष्ण के दायह अंग से और पंचमुखी शिव का प्राकट्य कृष्ण के वाम पार्श्व से हुआ है । नाभि से ब्रह्मा, वक्षस्थल से धर्म, वाम पार्श्व से पुन: लक्ष्मी, मुख से सरस्वती और विभिन्न अंगों से दुर्गा, सावित्री, कामदेव, रति, अग्नि, वरुण, वायु आदि देवी-देवताओं का आविर्भाव हुआ है ।

तभी तो द्रोणाचार्य सरीखे शास्त्रज्ञ गुरु भी जिस धर्म तत्व को नहीं समझ पायह भगवान श्रीकृष्ण जीवन भर उसी धर्म तत्व का अनुकरण करते रहे । जिसकी सराहना सदैव विदुर जैसे मनीषी ने की है ।

भीष्म पितामह जैसे धर्म सम्राट को भी धर्म तत्व का ज्ञान भगवान श्रीकृष्ण ने शर शैय्या पर लेटने के बाद सम्पूर्ण समर्पण के उपरांत समझाया था । यहाँ तक कि इन्होंने धर्म अधर्म के दो फाड़ कियह और आर्यावर्त के सभी राजाओं को धर्म के पक्ष में युद्ध करने के लिये प्रेरित किया अन्यथा तो महा प्रतापी अर्जुन भी धर्म के नाम पर युद्ध छोड़ भिखारी बनने को तैयार हो गये थे ।

युद्ध जीतने के पश्चात भी धर्मराज युधिष्ठिर भीष्म के सामने नेत्रों में अश्रु लिए धर्म का तत्व जानने के लिए चरणानुगत हुयह तब भीष्म के आग्रह पर भगवान श्रीकृष्ण ने वहां खड़े बड़े बड़े विद्वानों की भामित बुद्धि से अधर्म का नाश करके धर्म की गुत्थियों को खोल कर रख दिया । यही श्रीकृष्ण के ब्रह्म स्वरूप का अप्रगट स्वरूप था ।

भगवान श्रीकृष्ण ने बतलाया कि धर्म सदा देश-काल-परिस्थिति सापेक्ष होता है । कोई कर्म ऐसा नहीं है जो स्वयं में पाप या पुण्य हो । एक ही कर्म को पाप या पुण्य अलग अलग देश काल परिस्थिती बनती है । यह एक महीन रेखा के जिसे पूर्ण तत्व ज्ञानी ही समझ सकता है ।

दुष्टों के किसी भी प्रकार दमन को भगवान श्रीकृष्ण धर्मानुमोदित मानते थे । कर्ण अर्जुन युद्ध में निहत्थे कर्ण को मारना उन्होंने धर्मोचित बतलाया था, क्योंकि उनके अनुसार सदा अधर्म के पोषक को धर्माचरण की आशा रखने का क्या अधिकार है ?

अनुचित रूप से बार बार मथुरा पर चढ़ाई करने आयह कालयवन को धोखा देने को भी उन्हेंने धर्म ही माना है । भगवान श्रीकृष्ण का मत था कि अधार्मिकों के साथ यदि पूर्ण धर्म का पालन किया जायेगा, तो अधार्मिकों का हौसला बढ़ेगा और धर्म की ही हानि होगी ।

उन्होंने इस भ्रम को भी ख़त्म किया कि धर्म का नीति साथ चोली दामन का साथ है । कहाँ कहाँ धर्म को प्रधानता देनी चाहियह और कहाँ कहाँ नीति को, इसे भी उन्होंने खूब स्पष्ट तरीके से प्रयोग करके समझाया । नीति का उपयोग जहाँ धर्मरक्षा में होता है, वहां वह नीति को प्रधानता को स्वीकारते हैं और जहाँ नीति से धर्म की हानि होती है वहां वह नीति को त्यागने में कोई संकोच नहीं करते हैं । क्योंकि उनका उद्देश्य धर्म की रक्षा है ना कि नीति की । फिर चाहे वह अर्जुन द्वारा युधिष्ठिर पर शस्त्र उठाने का प्रसंग हो, या द्रोण के वध का प्रसंग हो या फिर अश्वत्थामा को मारने की अर्जुन की प्रतिज्ञा का प्रसंग हो ।

व्यावहारिक ज्ञान, राजनैतिक ज्ञान, धार्मिक ज्ञान से लेकर दार्शनिक ज्ञान आदि कुछ भी हो सर्वज्ञानमय कृष्ण ही पूर्ण थे ? जिसके कारण आज भी पांच हज़ार दो सौ वर्ष बाद भी श्रीमद्भागवत गीता के 700 श्लोकों नित नयह व्यावहारिक और चमत्कारिक ज्ञान से सापेक्ष्य प्रस्फुटित हो रहे हैं। यह ज्ञान एक ब्रह्म ऊर्जा से ओत प्रोत ईश्वर का अंश ही दे सकता है ।

ब्रह्म ऊर्जा से ओत प्रोत होने के कारण ही भगवान श्रीकृष्ण सदा सर्वदा भयानक बनी रही परिस्थितियों में कभी भी एक क्षण शोकाकुल नहीं रहे, बल्कि हँसते, मुस्कुराते और विनोद का एक भी अवसर नहीं छोड़ते थे । ग्वालों के साथ बंसी बजा रहे हैं, सखे-सखियाँ सब भूलकर नृत्य करते, जब समीप कृष्ण हैं तो और किसका ख्याल रहे ?

बंदरों पर मक्खन लुटा रहे, मट्टी खाकर माँ को छकाते हैं, छकड़ियों से माखन के मटके उल्टाए जाते, उखल में बंधकर यमलार्जुन का उद्धार किया, फलवाली दो तीन दाने धान के पाकर सब कुछ पा गयी है, अर्जुन के साथ सैर सपाटे का आनन्द लूटा जा रहा है। फिर भी कहीं लिप्त नहीं थे । यह कार्य एक ब्रह्म ज्ञानी ही कर सकता है ।

भगवान श्रीकृष्ण ही हैं जो संसार में आज तक कभी दुःख के पाश में नहीं फंसे । जो सब तरह के लौकिक सुख भोगते हुए भी पूर्ण कर्तव्यनिष्ठ रहे । संसार में लिप्त दिखकर भी आत्मनिष्ठ रहे । और दिव्य लोकोत्तर कर्मों द्वारा सारे जगत का तारणहार बने रहे ।

सभी चिंता से दूर, निःसन्देह यह ही परम ब्रह्म, परमानन्दघन, परमात्मा के लक्षण हैं । जिसे समझ पाना सामान्य जीवकोटि के पूर्णतः बाहर की बातें हैं । यह ही पूर्ण विकसित पुरुषोत्तम ब्रह्म भगवान के लक्षण हैं । इस तरह नराकृति परब्रह्म स्वराट पुरुष भगवान् श्रीकृष्ण ही इस जगत के एकमात्र निरंकुश एवं एकछत्र स्वामी हैं ।

ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः।
ज्ञानवैराग्ययोगश्चैव षष्णाम् भग इतीरणा।।
वैराग्यं ज्ञानमेश्वर्यं धर्मश्चेत्यात्मबुद्धयः।
बुद्धमः श्रीर्यशश्चैते षड वै भगवतो भगाः।।
इन सब लक्षणों की समग्रता भी श्री भगवान के लिए कम ही है।

अधिष्ठानभूत ब्रह्म श्री कृष्ण के लिए भगवान आदि शंकराचार्य कहते है –
भूतेष्वन्तर्यामी ज्ञानमयः सच्चिदानन्दः।
प्रकृतेः परः परात्मा यदुकुलतिलकः स एवायम्।।
जो ज्ञानस्वरूप, सच्चिदानन्द, प्रकृति से परे परमात्मा सब भूतों में अन्तर्यामी रूप से स्थित है, यह यदुकूल भूषण श्रीकृष्ण वही तो हैं।

तभी तो स्वयं योगनिद्रा द्वारा ‘श्रीकृष्ण कवच’ का उल्लेख किया गया है । जो उनके पूर्ण ब्रह्म होने का सूचक है । जिसके पाठ से दैहिक, दैविक तथा भौतिक भयों का समूल नाश हो जाता है । इसी तरह श्रीकृष्ण के तेंतीस नामों का पाठ करने से परम ज्ञान की प्राप्ति होती है । इसी तरह भगवान के मात्र ग्यारह नामों- राम, नारायण, अनंत, मुकुंद, मधुसूदन, कृष्ण, केशव, कंसरि, हरे, वैकुण्ठ और वामन को अत्यन्त पुण्यदायक तथा सहस्त्र कोटि जन्मों का पाप नष्ट करने वाला बताया गया है।

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि पृथ्वी पर ‘अन्नदान’ से बढ़कर कोई दूसरा दान नहीं है । इसीलिये मात्र भगवान श्रीकृष्ण ही हैं जिन्हें सर्वाधिक 56 प्रकार के भोग लगा कर प्रसाद में जान सामान्य को बाँट दिया जाता है ।

यही कारण है कि आज पञ्च हजार दो सौ साल बाद भी संसार में सबसे अधिक प्रेम मनुष्यों का श्रीकृष्ण पर ही देखा जाता है । इहलोक और परलोक की हर श्रेणी में श्रीभगवान के भक्तों की जितनी संख्या है, उतनी अन्य किसी की नहीं है । जो जिस श्रेणी का है, अपने ही तरीके से भगवान को प्रसन्न करने में लगा है। संसार में ऐसी कोई भी श्रेणी है ही नहीं जिसमें भगवान श्रीकृष्ण की विभूति के दर्शन न हों, जिसमें अचिन्त्य भगवान श्रीकृष्ण की लीलाकिरणों की स्फुरणा न हो।

संसार में मनुष्य ही नहीं पशु, पक्षी, लता, वृक्ष, पत्थर, पहाड़, नदियाँ, और ताल सभी के सभी माधव के स्तवन में मोहितचित्त हैं। सारा चर-अचर, दृश्य-अदृश्य जगत उन्हीं चितचोर के आकर्षण पाश में बंधा हुआ है। उन्हीं के आकर्षण से स्थिर हो रहा है। ऐसे ब्रह्म अचिन्त्य मोहन हमें अपनी अहैतुकी भक्ति देने की कृपा करें और हमें भी धर्म की रक्षा का सामर्थ्य दें जिससे अधर्मियों का नाश हो सके ।

इसीलिये हम उन्हें सत्य सनातन वैदिक धर्म के प्रखर दीप्त-प्रभाकर अनंतकोटि ब्रह्माण्डनायक सर्वान्तरात्मा भगवान परात्पर परब्रह्म श्रीकृष्णचंद्र परमानंदकंद श्यामसुन्दर मदनमोहन व्रजेंद्रनंदन आदि अनेकों नाम से पुकारते हैं ।।

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योगेश कुमार मिश्र 

ज्योतिषरत्न,इतिहासकार,संवैधानिक शोधकर्ता

एंव अधिवक्ता ( हाईकोर्ट)

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