मणिकर्णिका घाट पर धनाकर्षण तंत्र साधना : Yogesh Mishra

प्राचीन ग्रन्थों के अनुसार मणिकर्णिका घाट का स्वामी वही डोम राजा चाण्डाल था ! जिसने रघुवंश के सत्यवादी राजा हरिशचंद्र को खरीद लिया था ! किंतु प्रश्न यह है कि बैरागी की नगरी काशी के चांडाल के पास इतनी संपन्नता आयी कहां से कि उसने महाप्रतापी रघुवंश के सत्यवादी हरिश्चंद्र को ही खरीदी लिया !

इसका जवाब है ! तारकेश्वर शिवलिंग की साधना जिस क्षेत्र में लोगों का अंतिम क्रिया-कर्म होता है वहीं स्थित है ! यह अब चिता के धुंये से पूरी तरह काला पड़ चुका है ! इसका पुनः निर्माण इंदौर की महारानी अहल्या बाई होल्कर ने कराया था !

यहाँ पर तंत्र शक्ति से धनाकर्षण शव साधना विद्या द्वारा किया जाता है ! आज भी इन तंत्र शक्तियों के पोषण के लिये यहाँ नियुक्त साधक पहले नरमुंडों को खून से नहलाते हैं ! फिर घंटों नरमुंडों को लेकर जलती चिताओं के सामने एक पैर पर खड़े होकर शव साधना करते हैं ! इस तंत्र साधना और इसके महत्‍व के बारे कभी मेरी वहां के पीठाधीश्वर महाश्मशान बाबा नागनाथ से घंटों बात हुआ करती थी !

उनका कहना था कि यहाँ अनेको तंत्र सिद्धयां जल्दी प्राप्त हो जाती हैं ! क्योंकि यह अघोरी साधना का जाग्रत स्थल है ! यहाँ भगवान काल भैरव और भोलेनाथ की तप स्थली रही है ! अत: उनकी आज्ञा से यहाँ जल्दी सिद्धियां प्राप्त होती हैं !

इसी कारण से यहाँ शमशान में राख कभी भी बुझती नही हैं और महाकाल भैरव की माया से ही यह अदृश्य तंत्र नगरी चलती हैं ! भगवान शिव का सबसे प्रिय धाम हैं ! जब कलयुग का अंत होगा ! तब भगवान शिव इस क्षेत्र को अपनी त्रिशूल पर धारण करेंगे जो पुन: नये युग की शुरुआत करेगी !

अमावस्या की काली अंधेरी आधी रात को जब सामान्य मनुष्य गहरी नींद में सोते हैं और सुनसान शमशान पर जीव-जंतुओं की रहस्यमयी आवाजें मन में डर भी पैदा करती हैं ! उस समय अघोरी-तांत्रिकों द्वारा शव साधना की जाती है !

शव साधना विशेष समय काल में और भी महत्वपूर्ण हो जाती है ! कृष्ण पक्ष की अमावस्या या शुक्ल पक्ष अथवा कृष्णपक्ष की चतुर्दशी वाले दिन यह बेहद चौकाने वाले महत्वपूर्ण परिणाम देती है ! इसके साथ यदि मंगलवार का संयोग हो जाये तो यह सोने पर सुहागे के समान है !

चारों दिशाओं में रक्षा हेतु गुरु, बटुक भैरव, योगिनी और श्रीगणेश की आराधना करके साधना के पूर्व कवच का निर्माण किया जाता है ! जो साधना में अवरोध करने वाली शक्तियों से रक्षा करती हैं ! इसमें भैरव और भैरवी की की भी साधना आवश्यक मानी गयी है ! वहीं सभी दिशाओं के दि‍गपाल की भी आराधना आवश्यक है !

अघोरियों द्वारा खास तौर से श्मशान में तीन प्रकार की साधनायें की जाती हैं ! जिनमें श्मशान साधना, शव साधना और शिव साधना शामिल हैं ! प्रमुख रूप से इन साधनाओं को अघोरी प्रसिद्ध शक्तिपीठों जैसे – कामाख्या शक्तिपीठ, तारापीठ, बगुलामुखी या भैरव आदि स्थानों पर करते हैं !

पर हम यहाँ तारकेश्वर शिवलिंग पर आघोर साधना की बात करते हैं ! अघोरी यदि पुरुष है, तो उसे साधना के लिये स्त्री के शव की आवश्यकता होगी और यदि अघोरी स्त्री है तो शव साधना के लिये उसे पुरुष का शव आवश्यक होती है ! परंतु शव का चयन करते समय इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिये कि शव किस श्रेणी का है ! किसी चांडाल कर्म तंत्र साधना में मरे हुये, दुर्घटना में मरे हुये या फिर अकारण अकाल मृत्यु से मरने वाले युवा का शव शवसाधना के लिये सर्वाधिक उपयुक्त है !

पहले ही समझ लीजिये कि शव साधना आसान नहीं है ! इस साधना को करते समय श्मशान में कई दृश्य और अदृश्य बाधायें आती हैं ! जिन्हें हटाना एक सिद्ध और जानकार ज्ञानी अघोरी ही अच्छी तरह से जानता है ! साधना के पूर्व ही अघोरी को संबंधित स्थान को भूत-प्रेतों और अन्य बाधाओं से सुरक्षित रखना होता है ! ताकि वह साधना के बीच में विघ्‍न पैदा न कर सकें ! इसके लिये अग्नि जो होती ही है ! उसे अघोरी मंत्रोच्चार करते हुये आसपास एक लकीर खींचते हुये कवच के एक घेरा बना देता है ! और साथ ही तुतई बजाता है ! जहाँ तक तुतई की आवाज जाती है ! वहां तक कोई भूत-प्रेत, पिशाच, जिन्न आदि कोई भी बाधा नहीं पहुंचाते हैं ! इसके बाद विधि-विधान से साधना आरंभ की जाती है !

जिस शव की साधना की जानी है ! उसे स्नान करवाकर, कपड़े से पोंछकर उस पर सुगंधित तेलों का छिड़काव किया जाता है ! लाल चंदन का लेप किया जाता है ! शव के उदर पर धनाकर्षण यंत्र स्थापित किया जाता है ! उत्तर कैलाश पर्वत की तरफ मुंह करके बैठकर यह साधना की जाती है ! साधना में लगातार शैव मंत्रोच्चार और क्रिया की जाती है ! शव साधना में विशेष बात यह है कि यह साधना अपने तांत्रिक गुरु की आज्ञा लेकर ही करना चाहिये अन्यथा यह मुसीबत भी बन सकती है !

भोग स्वरुप और साथ ही शराब चढ़ाना भी अनिवार्य होता है ! शव को भी यह चीजें अर्पित की जाती है ! साधना सफल और जाग्रत होने पर कुछ ही समय में देखते ही देखते मुर्दा या शव में से कराहने की आवाज आने लगती है ! यही साधना के सफलता की पहचान है !

पर इस साधना के पूर्ण होते तक साधक को अपना मन साधना से नहीं हटना चाहिये ! उसे मंत्रोच्चार जारी रखना चाहिये ! साधना पूर्ण होने पर साधक वह सिद्धी प्राप्त कर लेता है कि जिसके द्वारा जब जहाँ जितना धन चाहे प्राप्त कर सकता है ! फिर बस सिर्फ वर्ष में एक बार इसे पोषित करना पड़ता है !!

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योगेश कुमार मिश्र 

ज्योतिषरत्न,इतिहासकार,संवैधानिक शोधकर्ता

एंव अधिवक्ता ( हाईकोर्ट)

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