“वैष्णव संतों” की अच्छी मार्केटिंग ने निगल ली, भारतीय तपस्वीयों की “शैव उपासना” पध्यति

कभी आपने विचार किया कि अधिकांश विख्यात सन्त “वैष्णव उपासक” ही क्यों थे और शैव तपस्वीयों को असुर या राक्षस, दानव, पिशाच, गंधर्व, आदिवासी आदि क्यों कहा जाता था ! यह कुछ और नहीं बस वैष्णव समाज की मार्केटिंग थी !

वैष्णव संस्कृति के पोषक जब भारत आये और सरजू नदी के तट पर अयोध्या में अपना प्रथम नगर स्थापित किया ! तब उस समय संपूर्ण भारत में बस शैव उपासना ही हुआ करती थी ! शैव उपासना प्राकृतिक रूप से जंगलों में रहा करते थे और प्रकृति के साथ सामान्य जीवन यापन करते थे ! न वह प्रकृति का शोषण करते थे और न ही वह प्रकृति से डरते थे !

किंतु जब वैष्णव उपासक भारत आये तो उन्होंने सर्वप्रथम नगरों की स्थापना की और उसके अन्दर अपने भोग विलास के लिए भारत के प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा और उसका दोहन आरम्भ कर दिया ! क्योंकि प्राकृतिक संसाधनों को शैव उपासना अपना आराध्य मानते थे ! अत शैव उपासना ने वैष्णो का खुलकर विरोध किया और बहुत बड़े-बड़े युद्ध हुये ! जिन्हें देव असुर संग्राम के नाम से जाना गया !

परिणाम यह हुआ के भगवान शिव की उपासना करने वाले शैव उपासकों को वैष्णव ने असुर, राक्षस, भूत-प्रेत, पिशाच, जिनन आदि नकारात्मक नामों से संबोधित करना शुरू कर दिया ! जिससे वैष्णव समाज को उनसे घ्रणा हो और वैष्णव समाज शैव उपासकों के विरुद्ध एकजुट किये जा सकें !

दोनों उपासकों के बीच सभ्यता और संस्कृति का यह युद्ध काफी लंबे समय तक चला ! क्योंकि शैव उपासक जंगलों में बिखरे थे अतः अप्रशिक्षित अवस्था में वह प्रशिक्षित वैष्णव योद्धाओं से नहीं जीत पाये ! कालांतर में जब भारत में मुगलों का आक्रमण हुआ तब तक वैष्णव उपासक बड़े-बड़े नगरों का निर्माण करके भारत की अधिकांश भूमि पर स्थापित हो चुके थे !

अतः वैष्णव उपासकों ने अपनी संस्कृति के महामानव कहे जाने वाले व्यक्तियों को बलपूर्वक भगवान विष्णु के अवतार के रूप में “वेद व्यास” की तरह जोड़ा और कवियों के द्वारा भजन-कीर्तन आदि गा-गा कर वैष्णव संस्कृति का बहुत बड़े स्तर पर प्रचार प्रसार किया ! इस काल इतिहास में भक्ति काल के नाम से जाना गया है !

यह वैष्णव आन्दोलन उत्तर भारत में विष्णु के दो अवतार राम और कृष्ण के प्रति भक्ति भावना को लेकर चलाया गया “भक्ति आन्दोलन” था । कृष्ण की बाल लीला पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के “सूरदास” और गोकुल की गोपियों के साथ रासलीला पर वृंदावन के हरिदास, आत्मा और परमात्मा के बीच प्रेम के अनेक रूपों के प्रतीक के रूप में प्रारम्भिक सूफ़ियों की भाँति ही उड़ीसा के चैतन्य महाप्रभु ने संगीत मण्डलियाँ जोड़ी और कीर्तन को आध्यात्मिक अनुभूति के लिए प्रयुक्त किया ! जिससे वैष्णव धर्म का अनहद प्रचार हुआ ! गुजरात के नरसिंह मेहता, राजस्थान की मीराबाई, दक्षिण भारत के तुकाराम, वल्लभाचार्य, रामानुज, निम्बकाचार्य, मध्वाचार्य, आदि प्रमुख रहे !

शुरुआत में वैष्णव में इन्द्र और विष्णु अलग-अलग रूप थे। इन्द्र की कल्पना विष्णु से पहले ही कर ली गयी थी। उनकी प्रतिष्ठा भी विष्णु से अधिक थी। इसलिए विष्णु इन्द्रावरज या इन्द्र के अनुज कहलाते थे। पूजा की दृष्टि से भारत में शिव प्राचीनतम हैं। शक्ति या दुर्गा उनकी सहचरी थी।

ब्रह्मा तो वेद के प्रदाता ही हैं। किन्तु अच्छी मार्केटिंग के कारण ‘वैष्णव आन्दोलन’ के तेज प्रवाह ने सबको बहा दिया । गुप्त काल में वैष्णव धर्म को राज धर्म का सम्मान प्राप्त हुआ। पुराणों के नये संस्करण लिखे गये, जिनमें विष्णु को सर्वोपरि ठहराया गया।

अवतारों की कल्पना भी इसी प्रकार की गयी कि राम और कृष्ण को विष्णु का पूर्ण अवतार सिद्ध कर दिया गया। कृष्ण की प्रतिष्ठा के लिए महाभारत जैसे महा काव्य की रचना करवाई गई। भागवत पुराण, हरिवंश पुराण, रामायण आदि को लिपि बध्द किया गया ! पूर्व में रामायण श्रुति और स्मृति के आधार पर मात्र एक काव्य ग्रन्थ था ! महाभारत के लेखन के बाद इसे लिपि बद्ध किया गया था ! और गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस लिख कर रामलीला की शुरुआत करके राम को विख्यात किया !

जब ‘वैष्णव आन्दोलन’ प्रारम्भ हुआ तो पलड़ा “कृष्ण” का ही भारी था। परन्तु “राम कथा” में काव्यात्मक तत्वों की प्रधानता के कारण रामलीला के प्रभाव में विवेकशील वर्ग में रामचरित को कहीं अधिक सम्मान दिया ।

एकपत्नीव्रत, जनकल्याण और शौर्य के साथ दया, धर्म, विनय आदि में विश्वास रखने वाली जनता ने रामचरित में अपनी-अपनी आयु और स्थिति के अनुसार माता-पिता, बन्धु, सखा, रक्षक, वीर आदि सभी पारिवारिक आदर्शजनों के दर्शन कर लिये। रामायण का कथानक भी अपने में भारत की चारों दिशाओं को समेटे था। केकय जनपद, उत्तर-दक्षिण कोसल, मिथिला प्रदेश, सारा आदिवासी क्षेत्र, नासिक, किष्किन्धा और श्रीलंका का सिंहली भाग नगर और वनवासी जनों का परस्पर मिलन और पश्चात्वर्ती शैव-वैष्णव संघर्ष की पूर्व छाया भी। बस राम की कथा घर-घर में फैल गयी।

और ‘शैव सम्प्रदायों’ पाशुपत, कालामुख, लकुलीश, लिंगायत, और शाक्त दर्शन की रुक्षता और नीरसता से त्रस्त तथा असंगठित होने के कारण “शैव साहित्य” को समाज ने एक किनारे ढकेल कर “वैष्णव भक्ति” को अच्छी मार्केटिंग कर घर-घर पहुँचाया गया और पुरातन “शैव साहित्य” विश्व में लगभग विलुप्त हो चुके हैं !

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योगेश कुमार मिश्र 

ज्योतिषरत्न,इतिहासकार,संवैधानिक शोधकर्ता

एंव अधिवक्ता ( हाईकोर्ट)

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