ध्यान का जीवन में महत्व : Yogesh Mishra

एक सच्चा ध्यान करने वाला व्यक्ति, तभी ध्यान में स्थित कहा जा सकता है, जब उसका मन कामनाओं और वासनाओं के द्वारा विक्षुब्ध होकर, इधर- उधर न भटक रहा हो !

जब तक किसी व्यक्ति की विषयभोग की इच्छाएँ हैं, कामनाएँ हैं, वासनायें हैं, तब तक साधक का चित्त ध्यान में लगने वाला नहीं है !

जैसे ही चित्त संयत होता है, व्यक्ति अंतर्मुखी हो जाता है ! उसे स्पृहा नहीं परेशान करती है ! वह अंदर के शुद्ध चैतन्य आत्मतत्त्व का साक्षात्कार कर लेता है और उसी में पूर्णतः लीन हो स्थिर हो जाता है !

यहीं चित्त के चिर शांति की अवस्था है ! ऐसा ही व्यक्ति भली भाँति ध्यान में युक्त माना जा सकता है !

ध्यान यदि नियमित किया जाये, तो चित्त संस्कार की हलचल से शून्य हो जाता है ! व्यक्ति में अपने अन्दर ही उच्चस्तरीय चेतना प्रतिबिंबित होने लगेगी !

व्यक्ति का बाह्य जगत् में व्याप्त सभी कामनाओं, तामसिकताओं से सम्बन्ध स्वत: टूट जाता है ! चित्त शान्त और निर्मल हो जाता है ! ज्यों- ज्यों ध्यान गहरा होता जाता है, चित्त की निर्मलता बढ़ती जाती है !

इसीलिए नित्य- नियमित ध्यान करना चाहिये ! ध्यान ही एक मात्र चित्त को संयत करने का उपाये है !

इस तथ्य को जो समझ लेता है ! वह अपनी वासना व कामना को समाप्त कर मात्र ध्यान से अपनी वासना को प्रार्थना में बदल लेता है !

इसके बाद ही व्यक्ति के जीवन में आध्यात्मिक अनुभूतियों के द्वार खुलते हैं ! जो व्यक्ति को आनंदित ही नहीं करते बल्कि मुक्ति भी प्रदान करते हैं !!

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योगेश कुमार मिश्र 

ज्योतिषरत्न,इतिहासकार,संवैधानिक शोधकर्ता

एंव अधिवक्ता ( हाईकोर्ट)

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