जानिए । आज भारतीय वैदिक ज्योतिष में शोध की आवश्यकता क्यों है ? yogesh mishra

ज्योतिष में शोध की आवश्यकता क्यों है ?

ज्योतिष शास्त्रों में परम सत्य ईश्वर की वाणी संगृहीत की गई है। हमारे ऋषि-मुनियों ने युगों तक गहन चिंतन कर इस ब्रह्मांड में उपस्थित ज्ञान के इन गूढ़ रहस्यों को संगृहीत किया और उपयोग किया। ज्योतिष के इन गूढ़ रहस्यों का अध्ययन कर न केवल मनुष्य मात्र अपितु संपूर्ण विश्व के विकास कार्यों में सहयोग लिया जा सकता है। चाहे वह अध्ययन, चिकित्सा, औषधि का क्षेत्र हो या खगोल शास्त्र का।

ज्योतिष एक प्राचीनतम विज्ञान है जिसका उल्लेख वेदों में भी आता है। ज्योतिष को मुख्यतः दो भागों में बांटा जा सकता है।

प्रथम खगोल शास्त्र – जिसमें आकाश मंडल में विचरण करते हुए ग्रहों की स्थिति का शुद्ध आंकलन किया जाता है।

दूसरा – इन आकाशीय पिण्डों का प्रभाव पृथ्वी एवं मनुष्य जाति पर कैसा पड़ता है इसका अनुमान। जिसे फलित ज्योतिष कहते हैं।
खगोल शास्त्र को तो सभी वैज्ञानिक शुद्ध मानते हैं और इसकी शुद्धता को स्वीकार भी करते हैं और हो भी क्यों ना-आकाश में विचरण करते हुए ग्रह दर्शाते हैं। हजारों लाखों सालों में भी उनकी गति या मार्ग में परिवर्तन नहीं आता।

लेकिन इन सभी ग्रह पिण्डों का प्रभाव हमारे व्यक्तित्व पर या भाग्य पर कैसा पड़ता है? यह दर्शाने में कोई यंत्र सक्षम नहीं है। केवल एक सांख्यिकी ही हमें यह विचार करने पर मजबूर करती है कि इन सभी का प्रभाव हमारे शरीर पर अवश्य पड़ता है, हो भी क्यों न क्योंकि पूर्ण ब्रह्मांड में अरबों पिण्डों में केवल एक शक्ति
‘‘गुरुत्वाकर्षण शक्ति’’ में इस प्रकार बंधे होते हैं मानो एक सूत्र में पिरोये गए हों और निरंतर अपने केंद्र बिंदु के चारों ओर भ्रमण करते रहते हैं। यही गुरुत्वाकर्षण शक्ति मनुष्य को भी भेदती है और इस प्रकार उनके जीवन को प्रभावित करती है।

हमारे ऋषि-मुनियों ने इस गुरुत्वाकर्षण शक्ति को हजारों-लाखों साल पहले पहचान लिया था और इस शक्ति का मनुष्य के जीवन पर पड़ने प्रभाव को ज्योतिष के माध्यम से दर्शाया भी था। लेकिन आदिकाल में ज्ञान का आदान-प्रदान श्रुति द्वारा ही एक से दूसरे को किया जाता था। अतः इसमें बहुत संभावनाएं हैं कि एक से दूसरे तक श्रुति द्वारा जाने पर इसमें त्रुटि आ गई हों।

दूसरे मध्यकाल में मुगल साम्राज्य रहा है, तदुपरांत अंग्रेजों का शासन रहा है इन दोनों कालों में इतिहास के अनुसार ज्योतिष के ग्रंथों का नाश हुआ। इस कारण अब जो ज्योतिष का ज्ञान उपलब्ध है वह केवल अंश मांत्र है। इसीलिए आज ज्योतिषीय फलादेश पूर्ण रूप से सटीक नहीं बैठत है। इसमें इतनी उथलता आ गई। कि वैज्ञानिकों ने इसको पूर्ण रूप से ढकौसला ही मानना शुरु कर दिया है।

जिस प्रकार से आयुर्विज्ञान में निरंतर शोध कार्य हुए हैं और जनमानस का एक चिकित्सक पर विश्वास बढ़ा है। इसी प्रकार ज्योतिष में शोध किया जाये तो जनमानस का इस पर अवश्य ही विश्वास बढ़ेगा और इस महान् विज्ञान को मनुष्य के उद्धार के लिए उपयोग किया जा सकेगा। कुछ विश्वविद्यालयों में ज्योतिष पर शोध कार्य कराया जाता रहा है। लेकिन अधिकांशत: वह केवल विभिन्न लेखकों का संकलन एवं आलोचनात्मक संकलन मात्र तक ही सीमित रह गया।

कहीं भी इस प्रकार के शोधों का विवरण नहीं आता जिसमें कि विभिन्न ज्योतिषीय योगों की प्रमाणिकता पर कार्य किया गया हो। यहां तक कि ज्योतिष के आधार भूत नियमों को ज्यों का त्यों स्वीकार कर फलादेश कर दिया जाता है। जैसे- मंगल को मेष व वृश्चिक का स्वामित्व प्राप्त है, सप्तम भाव विवाह का भाव और पंचम भाव संतान आदि का भाव होता है।

हमें चाहिए कि ज्योतिष के आधारभूत नियम, योग एवं उपायों पर शोध कर उनकी शुद्धता की परख कर लेनी चाहिए। जिससे कि आम जनता का विश्वास ज्योतिष पर से न उठे। ज्योतिष को केवल मनुष्य ही नहीं अपितु प्राकृतिक आपदाओं व मौसम की जानकारी के लिए भी उपयोग में लाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त कृषि में ज्योतिष का उपयोग कर मौसम की पूर्व जानकारी देकर विशेष लाभ प्राप्त किया जा सकता है।
इसी विषय में सनातन ज्ञान पीठ शोध कार्य कर रहा है और ज्योतिष के आधारभूत नियम, योग एवं उपायों पर शोध कर समाज को लाभान्वित कर रहा है

अपने बारे में कुण्डली परामर्श हेतु संपर्क करें !

योगेश कुमार मिश्र 

ज्योतिषरत्न,इतिहासकार,संवैधानिक शोधकर्ता

एंव अधिवक्ता ( हाईकोर्ट)

 -: सम्पर्क :-
-090 444 14408
-094 530 92553

comments

Check Also

आध्यात्मिक दिव्य ऊर्जा का क्षय कैसे हो जाता है ? क्षय होने से बचाने के उपाय !

आध्यात्मिक दिव्य ऊर्जा के क्षय का सबसे प्रमुख कारण मन के सभी छोटे और बड़े …