आज भी उपलब्ध हैं सरस्वती नदी के प्रमाण : Yogesh Mishra

सनातन संस्कृति से घ्रणा करने वालों के द्वारा यह झूठ प्रचारित किया जाता है कि वैदिक कालीन सरस्वती नदी का कभी अस्तित्व नहीं रहा है ! वेदों में उल्लेखीत सरस्वती नदी का कभी कोई अस्तित्व नहीं रहा यह बात पिछले कुछ वर्षों तक मान्य थी ! इस धारणा की सत्यता को जांचने का कभी प्रयास नहीं किया गया !

पाश्चाय विद्वानों ने जो लिख और कह दिया वही भारतीय इतिहासकारों के अनुसार पत्थर की लकीर की तरह रहा ! अधिकतर इतिहासकार भारत के इतिहास की पुख्ता शुरुआत सिंधु नदी की घाटी की मोहनजोदड़ो और हड़प्पाकालीन सभ्यता से मानते थे लेकिन अब जबसे सरस्वती नदी की खोज हुई है, भारत का इतिहास बदलने लगा है ! अब माना जाता है कि यह सिंधु घाटी की सभ्यता से भी कई हजार वर्ष पुरानी है !

ऋग्वेद की ऋचाओं में कहा गया है कि यह एक ऐसी नदी है जिसने एक सभ्यता को जन्म दिया ! इसे भाषा, ज्ञान, कलाओं और विज्ञान की देवी भी माना जाता है ! ऋग्वेद की ऋचाओं को इस नदी के किनारे बैठकर ही लिखा गया था, लेकिन इस नदी के अस्तित्व को इसलिये नकारा जाता है कि इसे भारतीय हिन्दू सभ्यता की महानता का एक नया अध्याय खुलेगा ! महाभारत में सरस्वती नदी के मरुस्थल में ‘विनाशन’ नामक जगह पर विलुप्त होने का वर्णन है ! इसी नदी के किनारे ब्रह्मावर्त था, कुरुक्षेत्र था, लेकिन आज वहां जलाशय है !

एक फ्रेंच प्रोटो-हिस्टोरियन माइकल डैनिनो ने नदी की उत्पत्ति और इसके लुप्त होने के संभावित कारणों की खोज की है ! वे कहते हैं कि ऋग्वेद के मंडल 7वें के अनुसार एक समय पर सरस्वती बहुत बड़ी नदी थी, जो कि पहाड़ों से बहकर नीचे आती थी ! अपने शोध ‘द लॉस्ट रिवर’ में डैनिनो कहते हैं कि उन्हें बरसाती नदी घग्घर नदी का पता चला ! कई स्थानों पर यह एक बहुत छोटी-सी धारा है लेकिन जब मानसून का मौसम आता है, तो इसके किनारे 3 से 10 किलोमीटर तक चौड़े हो जाते हैं ! इसके बारे में माना जाता है कि यह कभी एक बहुत बड़ी नदी रही होगी ! यह भारत-तिब्बत की पहाड़ी सीमा से निकली है !

उन्होंने बहुत से स्रोतों से जानकारी हासिल की और नदी के मूल मार्ग का पता लगाया ! ऋग्वेद में भौगोलिक क्रम के अनुसार यह नदी यमुना और सतलुज के बीच रही है और यह पूर्व से पश्चिम की तरह बहती रही है ! नदी का तल पूर्व हड़प्पाकालीन था और यह 4 हजार ईसा पूर्व के मध्य में सूखने लगी थी ! अन्य बहुत से बड़े पैमाने पर भौगोलिक परिवर्तन हुए और 2 हजार वर्ष पहले होने वाले इन परिवर्तनों के चलते उत्तर-पश्चिम की ओर बहने वाली नदियों में से एक नदी गायब हो गई और यह नदी सरस्वती थी !

डैनिनो का कहना है कि करीब 5 हजार वर्ष पहले सरस्वती के बहाव से यमुना और सतलुज का पानी मिलता था ! यह हिमालय ग्लेशियर से बहने वाली ‍नदियां हैं ! इसके जिस अनुमानित मार्ग का पता लगाया गया है, उसके अनुसार सरस्वती का पथ पश्चिम गढ़वाल के बंदरपंच गिरि पिंड से संभवत: निकला होगा ! यमुना भी इसके साथ-साथ बहा करती थी ! कुछ दूर तक दोनों नदियां आसपास बहती थीं और बाद में मिल गई होंगी ! यहां से यह वैदिक सरस्वती के नाम से दक्षिण की ओर आगे बढ़ी और जब यह नदी पंजाब और हरियाणा से निकली तब बरसाती नदियों, नालों और घग्घर इस नदी में मिल गई होंगी !

पटियाला से करीब 25 किमी दूर दक्षिण में सतलुज (जिसे संस्कृत में शतार्दू कहा जाता है) एक उपधारा के तौर पर सरस्वती में मिली ! घग्घर के तौर पर आगे बढ़ती हुई यह राजस्थान और बहावलपुर में हाकरा के तौर आगे बढ़ी और सिंध प्रांत के नारा में होते हुए कच्छ के रण में विलीन हो गई ! इस क्षेत्र में यह सिंधु नदी के समानांतर बहती थी !

इस क्षेत्र में नदी के होने के कुछ और प्रमाण हैं ! इसरो के वैज्ञानिक एके गुप्ता का कहना है कि थार के रेगिस्तान में पानी का कोई स्रोत नहीं है लेकिन यहां कुछ स्थानों पर ताजे पानी के स्रोत मिले हैं ! जैसलमेर जिले में जहां बहुत कम बरसात होती है (जो कि 150 मिमी से भी कम है), यहां 50-60 मीटर पर भूजल मौजूद है !

इस इलाके में कुएं साल भर नहीं सूखते हैं ! इस पानी के नमूनों में ट्राइटियम की मात्रा नगण्य है जिसका मतलब है कि यहां आधुनिक तरीके से रिचार्ज नहीं किया गया है ! स्वतंत्र तौर पर आइसोटोप विश्लेषण से भी इस तथ्य की पुष्टि हुई है कि रेत के टीलों के नीचे ताजा पानी जमा है और रेडियो कार्बन डाटा इस बात का संकेत देते हैं कि यहां कुछेक हजार वर्ष पुराना भूजल मौजूद है ! आश्चर्य की बात नहीं है कि ताजे पानी के ये भंडार सूखी तल वाली सरस्वती के ऊपर हो सकते हैं !

सेटेलाइट चित्र : यह 6 नदियों की माता सप्तमी नदी रही है ! यह ‘स्वयं पायसा’ (अपने ही जल से भरपूर) औरौ विशाल रही है ! यह आदि मानव के नेत्रोन्मीलन से पूर्व काल में न जाने कब से बहती रही थी ! एक अमेरिकन उपग्रह ने भूमि के अंदर दबी इस नदी के चित्र खींचकर पृथ्वी पर भेजे ! अहमदाबाद के रिसर्च सेंटर ने उन चित्रों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला की शिमला के निकट शिवालिक पहाड़ों से कच्छ की खाड़ी तक भूमि के अंदर सूखी किसी नदी का तल है ! जिसकी चौड़ाई कहीं कहीं 6 मिटर है !

उनका यह भी कहना है कि किसी समय सतलुज और यमुना नदी इसी नदी में मिलती थी ! सेटेलाइट द्वारा भेजे गए चित्रों से पूर्व भी बहुत भूगर्भ खोजकर्ता इस निष्कर्ष पर पहुंच चुके हैं ! राजस्थान के एक अधिकारी एन.एन गोडबोले ने इस नदी के क्षेत्र में विविध कुओं के जल का रासायनिक परीक्षण करने पर पाया था कि सभी के जल में रसायन एक जैसा ही है ! जबकि इस नदी के के क्षेत्र के कुओं से कुछ फलांग दूर स्थित कुओं के जलों का रासायनिक विश्‍लेषण दूसरे प्रकार का निकला ! केन्द्रीय जल बोर्ड के वैज्ञानिकों को हरियाणश और पंजाब के साथ साथ राजस्थान के जैसलमेर जिले में सरस्वती नदी की मौजूदगी के ठोस प्रमाण मिले हैं !

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योगेश कुमार मिश्र 

ज्योतिषरत्न,इतिहासकार,संवैधानिक शोधकर्ता

एंव अधिवक्ता ( हाईकोर्ट)

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