संसार के प्रशिक्षण स्थल में हम सब केवल सहयोगी हैं
इस अनंत ब्रह्मांड में परम सत्य केवल एक ही है, और उस सत्य का बोध कराने वाले आदिगुरु केवल शिव हैं। जब हम चेतना के सर्वोच्च शिखर की बात करते हैं, तो वहां केवल शिव का ही वास होता है।
इस संपूर्ण सृष्टि में ज्ञान, वैराग्य और पूर्णता का एकमात्र स्रोत वही परम सत्ता है। इसलिए, यह परम सत्य है कि हम सभी के गुरु केवल और केवल भगवान शिव ही हैं।
यदि इस संसार में कोई भी मनुष्य स्वयं को ‘गुरु’ घोषित करता है, तो यह उसके ज्ञान का नहीं, अपितु उसके गहरे अहंकार का अशिष्ट प्रदर्शन मात्र है। ‘मैं गुरु हूँ’ इस धारणा में ही एक प्रकार का श्रेष्ठता बोध और दूसरे को अपने से अज्ञानी मानने का भाव छिपा होता है। जहाँ ‘मैं’ अर्थात अहंकार जीवित है, वहाँ वास्तविक ज्ञान का प्रकाश कैसे ठहर सकता है?
मनुष्य की चेतना जब स्वयं सीमाओं में बंधी है, तो वह किसी अन्य मनुष्य को पूर्णता का मार्ग कैसे दिखा सकता है? किसी मनुष्य द्वारा स्वयं को गुरु की पदवी पर बैठा लेना, अपनी अल्पज्ञता को विराट सत्य के समकक्ष खड़ा करने का दुस्साहस है।
वास्तव में, यह संपूर्ण संसार एक विशाल प्रशिक्षण स्थल है। जन्म से लेकर देह त्यागने तक की यह यात्रा एक निरंतर चलने वाली सीखने की प्रक्रिया है। इस कर्मभूमि में कोई भी सर्वज्ञानी होकर नहीं आता; हम सभी यहाँ अपनी-अपनी चेतना के विकास और परिष्कार के लिए आए हैं। जब संसार एक प्रशिक्षण स्थल है, तो यहाँ उपस्थित प्रत्येक प्राणी केवल एक विद्यार्थी है।
इस विराट पाठशाला में कोई मनुष्य किसी का गुरु नहीं हो सकता, बल्कि हम सब एक-दूसरे के सहयोगी और सहयात्री हैं। यात्रा के किसी मोड़ पर कोई व्यक्ति अपने पूर्व अनुभवों के आधार पर हमारा सहयोग कर सकता है, हमारा हाथ थाम सकता है, या हमारा मार्गदर्शन कर सकता है।
ठीक उसी प्रकार, किसी अन्य परिस्थिति में हम किसी दूसरे के मार्ग को सरल बनाने में उसके सहयोगी बन सकते हैं। यह परस्पर सहयोग और प्रेम का भाव है, गुरु और शिष्य के बीच के उच्च-निम्न वर्ग का भेद नहीं।
जब हम किसी साधारण मनुष्य को गुरु मान बैठते हैं, तो हम अनजाने में ही वैचारिक परतंत्रता की बेड़ियों में बंध जाते हैं और हमारी अपनी चेतना का स्वतंत्र विकास अवरुद्ध हो जाता है।
इसके विपरीत, जब हम आदिगुरु भगवान शिव को अपना एकमात्र गुरु मानते हैं और शेष सभी प्राणियों को अपना सहयोगी समझते हैं, तो हम हर प्रकार के मानसिक दासत्व से मुक्त हो जाते हैं। तब हम प्रकृति से भी सीखते हैं, एक साधारण मनुष्य से भी सीखते हैं और अपने स्वयं के अंतर्मन से भी सीखते हैं।
सहयोग और सहयात्रा की इस भावना से ही समाज में वास्तविक समरसता और समानता का जन्म होता है। इस मार्ग पर कोई श्रेष्ठ नहीं, कोई निम्न नहीं। हम सब एक ही परम तत्व के अंश हैं और उसी सत्य की ओर एक साथ कदम बढ़ा रहे हैं।
अतः, व्यक्ति-पूजा और अहंकार से बाहर निकलकर, हर प्राणी को अपना सहयोगी मानें और अपने भीतर के शिवत्व को जगाते हुए अपनी चेतना को केवल परम गुरु भगवान शिव में स्थिर करें।
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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