ध्रुव राठी के भारत आगमन से संघ और बीजेपी डरी हुई है ! यह वही संघ और बीजेपी है, जिसने हिन्दू ही नहीं अपने पूर्ण समर्पित कार्यकर्ताओं को भी धोखा दिया है ! उसी का परिणाम है कि पूरे भारत में लगभग 83,000 शाखाएँ संचालित करने वाला और 60 लाख सक्रिय स्वयंसेवक और 40 से अधिक अनुषांगिक संगठन रखने वाला 100 वर्षीय पुराना संघ आज एक 32 वर्षीय ध्रुव राठी से डरा हुआ है !
शायद संघ यह भूल गया था कि 21वीं सदी के सूचना और डिजिटल युग में प्रभाव और कद को मापने के पैमाने पूरी तरह बदल चुके हैं। पारंपरिक रूप से प्रभाव को संगठन के आकार, स्वयंसेवकों की संख्या और दशकों के इतिहास से आंका जाता था।
लेकिन सोशल मीडिया और स्वतंत्र जनसंचार के इस दौर में किसी एक व्यक्ति की आवाज भी दशकों पुरानी संस्थाओं पर भारी पड़ती दिखाई दे रही है।
इसी संदर्भ में यह बहस तेज हुई है कि क्या एक डिजिटल क्रिएटर के तौर पर ध्रुव राठी का तात्कालिक प्रभाव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे शताब्दी पुराने संगठन की स्थापित कथा (नैरेटिव) को चुनौती देने में कहीं अधिक तेज और प्रभावी साबित हो रहा है।
संघ की वैचारिक धारा काफी हद तक परंपरा, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और अनुशासन पर आधारित है, जिसे आज की ‘जेन-जी’ जनरेशन और मिलेनियल्स पीढ़ी पुरानी और अप्रचलित मानती है। संघ आधुनिक माध्यमों में अपनी बात उस सहजता से नहीं रख पाता, जिस भाषा को इंटरनेट-फ्रेंडली युवा समझता है।
ध्रुव राठी ने आधुनिक पीढ़ी की नब्ज को पहचाना है। वह डेटा, ग्राफ, वीडियो क्लिप्स और सीधी-सरल भाषा में जटिल राजनीतिक व नीतिगत मुद्दों को समझाते हैं। वह युवाओं को सिर्फ आदेश या विचारधारा नहीं देते, बल्कि उनके मन में सवाल खड़े करते हैं। नतीजतन, जिस युवा पीढ़ी को वैचारिक रूप से संघ अपने पक्ष में खींचने की कोशिश करता है, वही युवा ध्रुव राठी के वीडियो देखकर उन विचारों पर सवाल उठाने लगता है।
हालाँकि जब सत्ता और संघ समर्थित पूरा इकोसिस्टम किसी नैरेटिव को फैलाने के लिए करोड़ों रुपये और मीडिया तंत्र झोंक देता है, तब राठी का एक 20-30 मिनट का वीडियो उस नैरेटिव की कमजोर कड़ियों को उजागर कर करोड़ों लोगों के सोचने का नजरिया बदल देता है।
इस अर्थ में, एक व्यक्ति का यह डिजिटल प्रभाव पूरे तंत्र के लिए एक बड़ी वैचारिक चुनौती बन चुका है। संस्थाएं जितनी बड़ी और जटिल होती हैं, उनकी रक्षात्मक क्षमता उतनी ही कमजोर होती है, और राठी इसी खाली जगह का फायदा उठाते हैं।
हालांकि, जब ज़मीनी हकीकत और चुनावी राजनीति की बात आती है, तो संघ की जड़ें भारत के सामाजिक और संस्थागत ढांचे में लगभग 100 वर्षों से गहराई से जमी हुई हैं।
लेकिन जनमत तैयार करने, स्थापित सत्ता से सवाल पूछने और तात्कालिक डिजिटल जनचेतना को आकार देने के मोर्चे पर एक स्वतंत्र यूट्यूब क्रिएटर का इतना बड़ा प्रभाव यह साबित करता है कि आज के दौर में विचार और संचार की धार किसी भी विशालकाय संगठन के आकार से कहीं अधिक शक्तिशाली होता दिखाई देता है !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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