कर्म और प्रज्ञा का मिलन जिस क्षण होता है, उसी क्षण आपके जीवन का सच्चा राजयोग निर्मित होता है।
वैदिक ज्योतिष में कुण्डली के केंद्र भावों (1, 4, 7, 10) को भगवान विष्णु का स्थान माना गया है, जो हमारे कर्म, यथार्थ और निरंतर पुरुषार्थ के प्रतीक हैं। वहीं त्रिकोण भावों (1, 5, 9) को माता लक्ष्मी का स्थान कहा जाता है, जो हमारी प्रज्ञा, पुण्य और ईश्वरीय कृपा के सूचक हैं। जब किसी कुण्डली में केंद्र और त्रिकोण के स्वामियों का संबंध बनता है, अथवा कोई एक ही ग्रह दोनों का स्वामी बन जाता है, तब ‘राजयोग’ का परम पवित्र निर्माण होता है।
आम जनमानस में यह भ्रांति है कि राजयोग का अर्थ किसी ऊंचे पद पर बैठना या अथाह धन प्राप्त करना है। किंतु यथार्थ में सच्चा राजयोग वह अवस्था है जहाँ मनुष्य की सोच और उसके कर्म एक ही दिशा में प्रवाहित होने लगते हैं। जब मनुष्य का ‘पुरुषार्थ’ उसकी ‘बुद्धि’ का अनुसरण करता है, तब जीवन की हर भयानक आपदा से भी उसका एक नया उदय होता है। उदाहरण के लिए, वृषभ और तुला लग्न के लिए शनि इसी महान राजयोग का निर्माण करता है।
शनि अनुशासन, धैर्य, न्याय और प्रकृति से जुड़ाव का ग्रह है। यह योग सिद्ध करता है कि सफलता का कोई छोटा मार्ग नहीं है, बल्कि शून्य लागत की प्राकृतिक जीवनशैली और निरंतर स्वावलंबन ही सच्चे सुख का आधार है। राजयोग वह अवस्था है जहाँ व्यक्ति बाह्य संसार की कृत्रिमता और दिखावे को त्यागकर, अपने भीतर और बाहर एक पूर्णतः प्राकृतिक, सत्यनिष्ठ और समृद्ध परिवेश का निर्माण करता है।
इस राजयोग के शक्ति के विस्तार के लिये कुछ विशिष्ट क्रिया करना चाहिये !
जैसे राजयोग को फलीभूत करने के लिए स्वयं के हाथों से श्रम करना अनिवार्य है। खाली भूमि पर वन्य जीवों और पक्षियों के आश्रय के लिए विविध प्रकार के फलदार वृक्षों का सघन वन तैयार करें। मिट्टी, चूने और अन्य प्राकृतिक संसाधनों से भवनों का निर्माण कर प्रकृति के निकट रहें। यह प्रत्यक्ष श्रम शनि और राजयोग दोनों को अत्यंत बलवान बनाता है।
दूसरा बाज़ार की आर्थिक निर्भरता और उपभोग की प्रवृत्ति से स्वयं को मुक्त करें। जीवन में शून्य लागत के प्राकृतिक सिद्धांतों को अपनाएं। जो वस्तुएं प्रकृति ने हमें सहज ही दी हैं, उनका सम्मान करें और अपनी आवश्यकताओं को सीमित कर पूर्ण रूप से स्वावलंबी बनें।
तीसरा केवल भाग्य के भरोसे बैठना राजयोग का सबसे बड़ा अपमान है। अपने दैनिक जीवन में पुरुषार्थ को सबसे ऊंचा स्थान दें। युवाओं को किताबी और कृत्रिम शिक्षा के भ्रम से निकालकर उन्हें जीवनोपयोगी कार्यों में कुशल बनाएं, ताकि वे संस्थाओं के दास बनने के बजाय स्वयं अपना स्वतंत्र मार्ग प्रशस्त कर सकें।
राजयोग कोई ऐसा चमत्कार नहीं है जो आकाश से अचानक गिरेगा, बल्कि यह मनुष्य के सचेत, अनुशासित और प्रकृति-अनुकूल प्रयासों का मधुर परिणाम है। जब हम अपनी निर्मल बुद्धि (त्रिकोण) को सही दिशा देते हैं और लक्ष्य के प्रति कठोर परिश्रम (केंद्र) से पीछे नहीं हटते, तब हम स्वयं अपने जीवन में राजयोग का सृजन करते हैं।
यह अध्याय स्पष्ट रूप से यह उद्घोषणा करता है कि सच्चा राजा वह नहीं जिसके पास बाज़ार की बड़ी संपदा है, बल्कि वह है जिसने अपनी इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर ली है और जो एक ‘राज-ऋषि’ की भांति जीवन व्यतीत करता है।
मनुष्य का परम लक्ष्य आधुनिक अर्थव्यवस्था की अंधी दौड़ का हिस्सा बनना नहीं होना चाहिए, बल्कि प्रकृति के साथ एकरूप होकर एक ऐसे स्वावलंबी ग्राम या समाज की स्थापना करना होना चाहिए, जहाँ जीव-जंतु, वनस्पति और मनुष्य सभी पूर्ण सामंजस्य में रहें।
जब हम अपने कर्मों को इस महान और निःस्वार्थ उद्देश्य के साथ जोड़ लेते हैं, तब हमारे जीवन की प्रत्येक विपत्ति एक भव्य उदय का मार्ग प्रशस्त करती है। राजयोग का यही सच्चा विज्ञान है, जो हमें भौतिकता के जाल से निकालकर चेतना की पूर्णता तक ले जाता है।
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
कुण्डली परामर्श हेतु सम्पर्क कीजिये
मोबाईल : 9453092553
गुरुदेव योगेश कुमार मिश्र की फोटो और नाम के साथ 1280 × 1000 पिक्सेल में कम से कम शब्दों में एक चित्र बनाइये जिसमें गुरुदेव सुनेहरा सिल्क का कुर्ता पैजामा में गले में लाल पट्टा डाले है उसमें ॐ नम: शिवाय लिखा है वह मंच पर खड़े होकर अपने शैव ग्राम के सभागार में बहुत से शिष्यों को प्रवचन दे रहे हैं ! हाल पूरा भरा हुआ है ! ऊपर से स्पेस देते हुये बड़े शब्दों में हेडिंग रहेगी ‘जीवन के विशिष्ट राजयोग’ फोटो में गुरुदेव का एक ही चित्र प्रयोग कीजिये नाम के साथ कोई फोटो मत लगिए ! फोटो में उचित स्थान पर एक गोले के अन्दर लिखिये ज्योतिष श्रंखला – 3 संपर्क 9453092553

