ईश्वर का निवास केवल मंदिरों की चारदीवारी या पाषाण मूर्तियों में नहीं, बल्कि प्रकृति के कण-कण में है। बहती नदियाँ, लहलहाते पेड़ और चहचहाते पक्षी, यह सब ईश्वर का जीवंत और निश्छल स्वरूप है। इसलिए, प्रकृति का पोषण ही वास्तव में ईश्वर की सबसे बड़ी सेवा है।
जीव-जंतुओं की रक्षा करना हमारा सबसे पुनीत कर्तव्य है। जब हम किसी प्यासे मूक पशु को जल पिलाते हैं, किसी मुरझाते पौधे को सींचते हैं या किसी बेज़ुबान पक्षी के छिनते हुए आश्रय को बचाते हैं, तो हम परोक्ष रूप से उसी विधाता के चरण पखार रहे होते हैं।
ईश्वर ने इस सुंदर सृष्टि की रचना इस भाव से की थी कि सभी जीव यहाँ प्रेम और सद्भाव से रहें, लेकिन मनुष्य ने अपने स्वार्थ में प्रकृति का आंचल लहूलुहान कर दिया है। वन्य जीवों का रुदन और कटते हुए जंगलों की चीखें सीधे उस सृजनहार के हृदय को बेधती हैं।
यदि हम सच में ईश्वर के प्रति आस्था रखते हैं, तो हमें यह गहराई से समझना होगा कि जो हाथ किसी असहाय जीव की रक्षा के लिए आगे बढ़ते हैं, वह प्रार्थना में जुड़े हाथों से कहीं अधिक पवित्र होते हैं।
प्रकृति की हर श्वास में ईश्वर का वास है। जीवों को अभय दान देना और इस धरती को हरा-भरा रखना ही सच्ची ईश्वरीय वंदना है। आइए, हम सैकड़ों शैव ग्राम स्थापित करके प्रकृति को संवारकर अपने ईश्वर की सच्ची सेवा करें !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
शैव ज्ञान के लिये संस्थान की कक्षा से जुड़िये
मोबाईल : 9453092553

