प्रवृत्ति और निवृत्ति की यात्रा  

शैवों के लिये तर्पण कर्म व्यर्थ है !

वैष्णव संचय से शैव वैराग्य की दार्शनिक यात्रा

भारतीय सनातन दर्शन में जीवन को समग्रता से समझने के लिए दो समानांतर धाराएं प्रवाहित होती हैं, प्रवृत्ति (संसार से जुड़ना) और निवृत्ति (संसार से मुक्त होना)। इन दोनों अवस्थाओं का प्रतिनिधित्व क्रमशः वैष्णव और शैव वृत्तियां करती हैं।

समाज और सृष्टि को एक सुव्यवस्थित ढांचे में चलाने के लिए जहां वैष्णव वृत्ति नितांत आवश्यक है, वहीं चेतना के सर्वोच्च शिखर पर पहुंचने के लिए शैव वृत्ति का आश्रय लेना पड़ता है। यह केवल देवताओं की उपासना का भेद नहीं है, बल्कि मानव जीवन के ‘उत्तरदायित्व’ और ‘मुक्ति’ के मनोविज्ञान का अत्यंत गहरा विज्ञान है।

वैष्णव वृत्ति: संसार का पोषण, संचय और ऋणों का निर्वहन

वैष्णव वृत्ति मूलतः संसार को संवारने, सजाने और उत्तरदायित्व के निर्वहन का दर्शन है। भगवान विष्णु पालनकर्ता हैं, और पालन के लिए संसाधनों (लक्ष्मी) तथा एक सुव्यवस्थित समाज की आवश्यकता होती है। सृष्टि के चक्र को गतिमान रखने के लिए इस वृत्ति में निम्नलिखित सिद्धांत कार्य करते हैं:

संचय और उत्तराधिकार: धर्मपूर्वक धन और संपदा का संचय करना इस व्यवस्था की रीढ़ है, ताकि परिवार और समाज का भरण-पोषण हो सके। संचित संपदा और संस्कारों को सुरक्षित रखने के लिए एक सुयोग्य उत्तराधिकारी (पुत्र या संतति) की आवश्यकता होती है।

ऋण त्रय का सिद्धांत: उपनिषदों और स्मृतियों के अनुसार, गृहस्थ जीवन में मनुष्य पर देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण होते हैं।

पितृ तर्पण की अनिवार्यता: पितृ ऋण को चुकाने के लिए संतति उत्पन्न करना और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने हेतु ‘तर्पण’ व ‘श्राद्ध’ करना अनिवार्य है। यह कर्म मनुष्य को उसके सामाजिक और पारिवारिक उत्तरदायित्व सिखाता है।

परंतु, जब आत्मा पूर्णता की पुकार सुनती है और सांसारिक कर्तव्यों से परे एक वृहद यात्रा पर निकलती है, तब वह निवृत्ति मार्ग में प्रवेश करती है।

शैव वृत्ति और उपनिषदों का उद्घोष: त्याग से अमरत्व

शैव वृत्ति संसार को चलाने का नहीं, बल्कि संसार के मोह से मुक्त होने का विज्ञान है। भगवान शिव वैराग्य और लय के प्रतीक हैं। जब साधक इस मार्ग पर बढ़ता है, तो भौतिक संपदा और उत्तराधिकार का महत्व शून्य हो जाता है।

इस वैराग्य का सबसे सशक्त दार्शनिक आधार कैवल्य उपनिषद में मिलता है। संसार के संचय और संतति (पुत्र) से मोक्ष की धारणा को खंडित करते हुए उपनिषद उद्घोष करता है:

“न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः।”

(अर्थात: न कर्मकांड से, न प्रजा/संतान से, और न ही धन से, बल्कि केवल त्याग से ही अमरत्व या मोक्ष प्राप्त होता है।)

यह श्लोक स्पष्ट करता है कि चेतना के परम शिखर पर पहुंचने के लिए ‘त्याग’ ही एकमात्र साधन है। जब साधक के भीतर से ‘देहाभिमान’ (स्वयं को एक भौतिक शरीर और गोत्र का हिस्सा मानने का भाव) समाप्त हो जाता है, तो उसके लिए संचित धन और पुत्र द्वारा किए जाने वाले तर्पण का मोह स्वतः समाप्त हो जाता है। जो देह से परे चला गया, उसके लिए पितृ ऋण शेष नहीं रहता।

कर्म संन्यास और महाकल्याण: सांसारिक बंधनों से पूर्ण विदाई

शैव वृत्ति में प्रवेश करने वाले साधक या संन्यासी के लिए कर्मकांडों से विदाई का एक अत्यंत कठोर और वैज्ञानिक विधान है। इसे जाबाल उपनिषद में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है, जहां संन्यास के व्यावहारिक नियमों को प्रतिपादित किया गया है।

जीवित श्राद्ध (आत्म-श्राद्ध): संन्यास दीक्षा के समय साधक अपना स्वयं का पिंडदान और श्राद्ध संपन्न कर लेता है, जो इस बात का प्रतीक है कि सांसारिक और पारिवारिक दृष्टि से उसका देहांत हो चुका है।

शिखा और सूत्र का त्याग: जाबाल उपनिषद के निर्देशानुसार, संन्यासी अपनी शिखा (चोटी) का मुंडन कराकर और यज्ञोपवीत (जनेऊ) को अग्नि में स्वाहा कर देता है। यज्ञोपवीत वैदिक कर्मकांडों (जैसे तर्पण, श्राद्ध, यज्ञ) के अधिकार का प्रतीक है। इसके त्याग का अर्थ है कि अब साधक पर गोत्र या परिवार का कोई नियम लागू नहीं होता।

व्यष्टि से समष्टि की यात्रा: तर्पण और उत्तराधिकार के पार जाने का अर्थ स्वार्थी होना नहीं है। जो व्यक्ति संसार से मुक्त हो गया है, वह ‘लोक कल्याण’ और ‘महा कल्याण’ में लीन हो जाता है।

अष्टावक्र गीता और योगवासिष्ठ इसे ‘जीवन्मुक्त’ की अवस्था कहते हैं। ऐसा शिव-समर्पित महापुरुष शरीर में रहते हुए भी विदेह होता है। उसका जीवन संपूर्ण चराचर जगत के कल्याण के लिए एक ब्रह्मांडीय ऊर्जा बन जाता है।

संसार को एक अनुशासित प्रवाह में रखने के लिए नियम, गृहस्थ और तर्पण आवश्यक हैं, किंतु जब आत्मा पूर्णता की ओर अग्रसर होती है, तो वह इन सभी बंधनों को पीछे छोड़कर शिवमय हो जाती है, जहां कोई सांसारिक कर्म उसे बांध नहीं सकता है !!

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

शैव ज्ञान के लिये संस्थान की कक्षा से जुड़िये

मोबाईल : 9453092553

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