मानव का ईश्वर या परमात्मा से संबंध हमेशा से ही आस्था और विश्वास की नींव पर टिका रहा है। लेकिन आधुनिक दौर में यह संबंध ज्ञान, आत्म-शुद्धि या ‘मुक्ति’ की बजाय काफी हद तक ‘आध्यात्मिक उपभोक्तावाद’ में बदल गया है।
आज समाज का एक बड़ा वर्ग ईश्वर या गुरु के पास सत्य की खोज के लिए नहीं, बल्कि अपनी लौकिक समस्याओं के चमत्कार पूर्ण त्वरित समाधान और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए जा रहा है।
यह प्रवृत्ति समय-समय पर बदलते ‘आध्यात्मिक रुझानों’ में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। समाज हमेशा उस शक्ति-केंद्र की ओर तीव्रता से आकर्षित होता है, जहां से उसे चमत्कार की सबसे अधिक उम्मीद होती है !
एक दौर था जब शिर्डी के साईं बाबा के दरबार में अपार भीड़ उमड़ती थी, क्योंकि यह विश्वास गहरा था कि वहां हर भौतिक मुराद पूरी होती है। फिर समय के साथ ‘नाम जप’ और विभिन्न अनुष्ठानों की लहर आई, जहां यह धारणा बनी कि विशिष्ट मंत्रों के जाप मात्र से जीवन की हर बाधा दूर की जा सकती है।
वर्तमान में पॉडकास्ट और इंटरनेट संस्कृति ने एक नया चलन पैदा किया है। अचानक से लाखों लोग बाबा नीम करोली (कैंची धाम) की ओर आकर्षित हो रहे हैं। जब आम जनमानस यह देखता है कि दुनिया के बड़े-बड़े टेक अरबपति और सफल हस्तियां वहां से सफलता का आशीर्वाद पा चुके हैं, तो वह इसे अपनी समस्याओं के एक अचूक समाधान के रूप में देखने लगते हैं।
श्रद्धा का यह नया रूप अक्सर उस गहरी आध्यात्मिक शिक्षा को पूरी तरह नजरअंदाज कर देता है जो इन महान संतों ने दी थी। इसके बजाय, पूरा ध्यान केवल ‘चमत्कार’, ‘शक्ति’ और ‘सफलता’ के अंश पर केंद्रित हो जाता है।
भारतीय दर्शन में गुरु का अर्थ वह है जो अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाए, जो अज्ञान को मिटाए। लेकिन विडंबना यह है कि आज गुरुओं को ‘कल्पवृक्ष’ (इच्छा पूरी करने वाला पेड़) बना दिया गया है।
बहुसंख्यक वर्ग को न तो ईश्वर की वास्तविक प्रकृति जाननी है, न ही उन्हें जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति चाहिए। उन्हें मुख्य रूप से नौकरी, व्यवसाय में लाभ, बीमारियों से छुटकारा और पारिवारिक शांति चाहिए।
जब एक जगह से मुराद पूरी नहीं होती या जब समाज में कोई नया चमत्कारिक विकल्प सामने आता है, तो लोग बहुत आसानी से अपनी आस्था का केंद्र बदल लेते हैं।
आस्था का यह उपभोक्तावादी स्वरूप इंसान को कभी स्थायी शांति नहीं दे सकता। जब तक परमात्मा या गुरु से संबंध केवल ‘लेन-देन’ और ‘मांग’ पर आधारित रहेगा, तब तक यह एक अंतहीन दौड़ बनी रहेगी।
सच्ची आध्यात्मिकता चमत्कार की उम्मीद में शक्ति-केंद्रों को बदलने में नहीं है, बल्कि स्वयं के भीतर झांककर उस चेतना और स्थिरता को खोजने में है जो किसी भौतिक इच्छा की मोहताज नहीं होती।
जब तक धर्म को केवल इच्छा-पूर्ति का साधन माना जाएगा, तब तक आध्यात्मिक गहराई और वास्तविक आत्म-ज्ञान समाज से कोसों दूर रहेगा। न तो वह सही पध्यति से साधना कर पायेगा और न ही ईश्वर की कृपा प्राप्त कर पायेगा !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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