वैष्णव ब्रह्मचर्य धारण क्यों नहीं कर पाते हैं

मैं आज प्रात: एक आश्रम गया था, वहां पर गेट पर ही मैने एक बोर्ड पढ़ा “आश्रम में महिलाओं का प्रवेश वर्जित है !”

मेरे मन में यह विचार चला कि जब स्वामी जी गुणातीत और सर्व इन्द्रीय विजेता हैं, जैसा कि उनके शिष्य बतलाते हैं, तो इस बोर्ड का क्या औचित्य है ?

चिंतन यही से आगे बढ़ा, तो याद आया कि वैष्णव में देवताओं सहित अनेकों ऐसे दृष्टान्त मिलते हैं, जब इन्होंने छल बल से परस्त्री का भोग किया है !

जैसे – देवराज इन्द्र और अहल्या का दृष्टान्त, चंद्रदेव और देवगुरु बृहस्पति की पत्नी तारा का दृष्टान्त, विष्णु और जालंधर की पत्नी वृंदा का दृष्टान्त,  देवगुरु बृहस्पति द्वारा बड़े भाई ऋषि उतथ्य की पत्नी ममता का दृष्टान्त, महर्षि उतथ्य की दूसरी पत्नी भद्रा और जल के देवता वरुण का दृष्टान्त, देवराज इंद्र और महर्षि देवशर्मा की पत्नी रुचि दृष्टान्त ! आदि आदि ग्रंथों में सैकड़ों उदहारण मिलते हैं !

मतलब यह देवता जब ऋषियों, मुनियों, मनीषियों की बहु बेटियों को नहीं छोड़े, तो उनके जीवन दर्शन का अनुगमन करने वाले कथाकथित ब्रह्मचारी ब्रह्मचर्य के मौलिक सिधान्त का अनुगमन कैसे करेंगे ?

इसीलिये इनको मातृ शक्ति से भय लगता है ! क्योंकि यह तथाकथित ब्रह्मचारी ब्रह्मचर्य के मौलिक सूत्र को ही नहीं अपनाते हैं !

शैव जीवन दर्शन के अनुसार ब्रह्मचर्य शरीर और इंद्रियों को जबरदस्ती दबाना (दमन) नहीं है, बल्कि ब्रह्मचारी को ईश चेतना के जागरण से ही वासना से मुक्ति मिलती है। काम ऊर्जा (प्रजनन ऊर्जा) सृष्टि व्यवस्था का अंश है, इसलिये इसे बलपूर्वक नहीं हराया जा सकता है ! इस ऊर्जा का शैव यौगिक साधना द्वारा उधर्व परिवर्तन करके इससे मुक्त हुआ जा सकता है !

जैसे भीष्म पितामह, भगवान मुरुगन, नारद जी, सनक, सनंदन, सनातन, सनत्कुमार, अश्वस्थामा, कृपाचार्य, गुरु गोरक्ष नाथ जी महाराज, परशुराम, शुकदेव जी महाराज आदि आदि !

ब्रह्मचर्य के शैव यौगिक साधना विज्ञान पर यदि आप लेख चाहते हैं, तो कमेन्ट में अवश्य लिखिये !

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

शैव ज्ञान के लिये संस्थान की कक्षा से जुड़िये

मोबाईल : 9453092553     

बल्कि 

कामवासना का पूरी तरह नाश तभी संभव है जब आप स्वयं की आत्मा को शरीर से पूरी तरह अलग अनुभव करें।

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