आज विश्व जिन गहरे संकटों, मानसिक संताप और प्राकृतिक आपदाओं से जूझ रहा है, उसका मूल कारण हमारी वह भूल है जिसमें हमने ब्रह्मांड को उसका हक़ देना बंद कर दिया है।
प्राचीन सनातन व्यवस्था में अपनी आय का दसवां हिस्सा (दशमांश) मूक जीवों, पशु-पक्षियों, कीट-पतंगों और वनस्पतियों के संवर्धन के लिए दान करने का कठोर विधान था, जिसे ‘भूतयज्ञ’ कहा जाता था। परंतु आधुनिक मनुष्य प्रकृति का केवल दोहन कर रहा है।
सृष्टि के अन्य जीवों के विकास के लिए अपनी आय का 10% देना हमने पूरी तरह बंद कर दिया है। प्रकृति से लेना और उसे वापस न लौटाना ही हमारे जीवन का सबसे बड़ा संकट बन चुका है।
आजकल दान की परिभाषा भी विकृत हो गई है। हम जो भी दान करते हैं, वह करुणा या जीव-कल्याण के भाव से नहीं, बल्कि अपने अहंकार की पुष्टि के लिए करते हैं। दान-पट्टिकाओं पर अपना नाम लिखवाना या समाज में रुतबा बढ़ाना वास्तविक दान नहीं है।
ज्योतिषीय दृष्टि से, अहंकार का कारक सूर्य है और निस्वार्थ सेवा व मूक जीवों का कारक शनि है। शनि ऐसे दिखावटी या राजसिक दान को कभी स्वीकार नहीं करता, क्योंकि यह केवल व्यक्ति के ‘मैं’ को पोषित करता है।
नवग्रहों में शनि कर्मफलदाता और ब्रह्मांडीय दंडाधिकारी हैं। जब मनुष्य प्रकृति का हक़ मारकर अपनी तिजोरियां भरता है, तो वह एक भारी ‘ब्रह्मांडीय ऋण’ अपने ऊपर लाद लेता है।
इसी कारण, जब शनि गोचर में नीच का (मेष राशि में) आता है या अपनी मारक दशा में प्रवेश करता है, तो वह एक कठोर ऑडिटर की तरह कार्य करता है। नीच का शनि उस व्यक्ति के कर्मों का निर्मम हिसाब करता है जिसने जीवों का हक़ मारा है और अहंकार में जीवन जिया है। परिणामस्वरुप, शनि उस झूठे रुतबे, धन और सत्ता का सर्वनाश कर देता है।
यह सर्वनाश कोई ईश्वरीय कोप नहीं, बल्कि प्रकृति द्वारा अपना हिस्सा वापस छीनने की एक न्यायपूर्ण प्रक्रिया है। अतः जीवन के संकटों से बचने का एकमात्र मार्ग यही है कि हम बिना किसी स्वार्थ और अहंकार के, अपनी आय का एक निश्चित हिस्सा पुनः प्रकृति और मूक जीवों के लिए समर्पित करना शुरू करें। यही सच्चा ज्योतिषीय उपाय और जीवन का शाश्वत सत्य है।
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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