शिव सहस्त्रार ग्रन्थ का महत्व : Yogesh Mishra

शिव सहस्त्रार एक तमिल भाषा में श्रुति और स्मृति के आधार पर संग्रहित किया गया ऐसा ग्रंथ है, जो राम रावण युद्ध के बाद विलुप्त हो गया ! लेकिन इसका बहुत बड़ा अंश तमिल लोकगीतों में बहुत समय तक चर्चा में रहा !

 जन श्रुतियों के अनुसार इस संपूर्ण ग्रंथ में 1008 सूत्र हैं ! किन्तु बहुत शोध के बाद अब मात्र 777 सूत्रों को ही प्राप्त किया जाना संभव हो सका है !

 क्योंकि यह ग्रंथ भगवान शिव और रावण के मध्य का उपनिषद संवाद है ! अतः वैष्णव आक्रांताओं ने इसमें कोई रुचि नहीं दिखलाई और काल के प्रवाह में धीरे धीरे मुक्ति प्राप्ति के यह समस्त प्राकृतिक सूत्र ज्ञान विलुप्त होते चले गये !

 इस ग्रंथ का महत्व राम रावण के समकालीन महर्षि वशिष्ठ ने समझा था और वह यह जानते थे कि राम इस ग्रंथ के सूत्रों की अनुभूति के बिना कभी भी महापुरुष नहीं बन पाएंगे !

 अतः गुरु वशिष्ट ने इस शिव सहस्त्रार सूत्र को सामान्य वैष्णव भाषा में भगवान श्रीराम को समझाया ! जिसका संग्रह रामायण ग्रन्थ के रचियता महर्षि बाल्मीकि जी ने किया और कालांतर में वैष्णव लेखकों ने इसे योग वशिष्ठ का नाम दिया !

 योग वशिष्ठ का विकसित रूप ही श्रीमद भगवत गीता है ! जिसे वेद व्यास ने भगवान श्री कृष्ण और अर्जुन के संवाद के माध्यम से प्रगट किया ! जिसमें आत्म कल्याण के लिए तीन मार्ग बतलाये गये हैं ! जो कि श्रीमद भगवत गीता को शिव सहस्त्रार सूत्र से अलग करते हैं !

 किंतु भगवान शिव द्वारा रावण को दिये गये शिव सहस्त्रार सूत्र ज्ञान में भक्ति योग या कर्म योग का वर्णन बिल्कुल नहीं है ! शायद इसका कारण यह रहा होगा कि भगवान शिव जानते थे कि रावण मेरा अनन्य भक्त है और परम पुरुषार्थी भी है ! अतः इसे भक्ति योग और कर्म योग पर ज्ञान देना व्यर्थ है !

किंतु ज्ञान योग का इस संपूर्ण ग्रंथ में विस्तार से वर्णन किया गया है और भगवान शिव द्वारा स्वयं रावण को यह बतलाने की चेष्टा की गई है कि व्यक्ति को अपने मुक्ति के लिये किसी भी मंदिर, ग्रंथ, मूर्ति, घंटा-घड़ियाल, कर्मकांड, अनुष्ठान, व्रत आदि की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि यह सब तो मात्र मुक्त की प्राप्ति में सहायक हो सकते हैं ! पर महत्वपूर्ण कभी नहीं !

 भगवान शिव ने रावण को इस उपदेश में जो तत्वज्ञान दिया ! उस तत्व ज्ञान के आधार पर रावण को राजा जनक की तरह जीवित अवस्था में ही विदेह की स्थिति प्राप्त हो गई थी ! वह तो मात्र अपने को संसार में बनाये रखने के लिये स्वयं को खेचरी योग अवस्था में रखता था !

 वाल्मीकि रामायण के अनुसार रावण वेद अनुगामी, तपस्वी ब्राह्मण था ! जो त्रिकाल संध्या करता था और उसने अपने रक्ष साम्राज्य में नागरिकों के लिये भी त्रिकाल संध्या संध्या अनिवार्य कर रखी थी ! जो स्वेच्छा से त्रिकाल संध्या नहीं करता था, उसे राज पुरुषों द्वारा दंडित किया जाता था !

 रावण का यह मानना था कि त्रिकाल संध्या से मनुष्य में एकाग्रता और सात्विकता पैदा होती है ! एकाग्रता और सात्विकता से आत्मसंयम पैदा होता है ! आत्मसंयम से वैराग्य की उत्पत्ति होती है और वैराग्य ही मुक्ति का मार्ग है !

 इसलिए शिव सहस्त्रार में दिये गये सिद्धांतों का मनन और चिंतन करके व्यक्ति मुक्ति को प्राप्त कर सकता है ! जिसका वर्णन स्वयं भगवान शिव ने रावण जैसे महा पराक्रमी विद्वान से किया हैं ! यही इस ग्रंथ का महत्व है !!

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

कुण्डली परामर्श हेतु सम्पर्क कीजिये

मोबाईल : 9453092553

और अधिक जानकारी के लिये पढ़िये

www.sanatangyanpeeth.in

आन लाईन गुरुकुल के पाठ्यक्रम के लिये निम्न लिंक क्लिक कीजिये !

http://gurukul.sanatangyanpeeth.com/

Share your love
yogeshmishralaw
yogeshmishralaw
Articles: 2133

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *