शैव जीवन शैली में मुक्ति की प्राप्ति के लिये भगवान शिव द्वारा रावण को जो तत्वज्ञान दिया गया था, जिससे रावण प्रकांड ब्राह्मण ही नहीं बना बल्कि उसने परम मुक्ति की अवस्था में अमृत्व को भी प्राप्त कर लिया था !
उस तत्वज्ञान को ही शिव सहस्त्रार ज्ञान के नाम से “रक्ष संस्कृति” में जाना जाता है ! यह ज्ञान मूलतः अनादि भाषा तमिल में है ! जो समस्त “रक्ष राष्ट्र” में लोक गीतों के माध्यम से प्रचलित था !
रावण की मृत्यु के साथ ही रक्ष संस्कृति का पतन होने के कारण शैव जीवन शैली का यह तत्वज्ञान वैष्णव आक्रांताओं के प्रभाव में काल के प्रवाह से धीरे धीरे विलुप्त हो गया !
इस प्राकृतिक तत्व ज्ञान से प्रभावित होकर महर्षि बाल्मीकि ने कालांतर में राम और वशिष्ठ के संवाद के रूप में एक महान ग्रंथ लिखा, जिसे वैष्णव लोगों ने “योग वशिष्ठ” का नाम दिया किंतु इस ग्रंथ में भगवान शिव द्वारा दिये गये “प्राकृतिक तत्व ज्ञान” के समग्र अंश को नहीं लिया गया है !
इसमें उतना ही हिस्सा लिया गया है, जितना कि वैष्णव जीवन शैली के साधकों के तत्व ज्ञान को जानने के लिये आवश्यक था ! शेष को छोड़ दिया गया है !
कालांतर में भगवान श्री कृष्ण के मुख से अर्जुन को उपदेश के रूप में इसी “शिव तत्व ज्ञान”” का कुछ अंश श्रीमद्भागवत गीता में भी “ज्ञान योग” के नाम से बतलाया गया है और इसी “प्राकृतिक शिव तत्व ज्ञान” के अंशों पर 108 से अधिक वैष्णव गुरुकुलों में उपनिषदों का निर्माण किया गया है !
किंतु समग्र रूप में किसी भी एक जगह इस तत्वज्ञान के समग्र स्वरूप का वर्णन नहीं है !
इसी संदर्भ में एक विशेष सत्र सनातन ज्ञान पीठ आरंभ करने जा रहा है ! यह संपूर्ण शोध सत्र होगा ! जिसमें “शैव जीवन शैली” के तत्वज्ञान पर चर्चा होगी ! जो भी साथी इस सत्र में प्रवेश लेना चाहते हैं ! वह कार्यालय में संपर्क कर सकते हैं !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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