भगवान शिव के उपासक जीव अघोर क्रिया साधना द्वारा दूसरे के ओरे में प्रवेश करके उसके रोग को अपने ओरे में खींच लेते हैं और उन रोगों को अपने जीवनी ऊर्जा के ताप से जला देते हैं।
यह मृत संजीवनी विद्या के तीसरे चरण की ऊर्जा क्रिया साधना है। इस साधना को गुरु शिष्य परंपरा में आज भी शैव गुरु योग्य शिष्य को सिखाते हैं !
शैव तंत्र विज्ञान में यह मान्यता है कि दुनियां के सभी रोग आपके स्वभाव से निर्मित होते हैं ! जब आपका स्वभाव प्रकृति के नियमों के विपरीत होता है, तब प्रकृति आपके ओरे का शोधन बंद कर देती है और आपके ओरे में जमा प्रकृति विरोधी गन्दगी ही आपके पिण्ड ( शरीर ) में सैकड़ों असाध्य रोग पैदा करते हैं !
लोभ, मोह, छल, प्रपंच, घ्रणा, ईर्ष्या आदि प्रकृति विरोधी ऊर्जा है, जिसके विचारों में यह प्रकृति विरोधी ऊर्जा निर्मित होती है, वह निश्चित रूप से असाध्य रोग से पीड़ित रहेगा ही !
जिसे भगवान शिव के उपासक जीव अघोर क्रिया साधना द्वारा दूसरे के ओरे में प्रवेश करके रोग के दूषित ऊर्जाओं को अपने ओरे में खींच कर अपने जीवनी ऊर्जा के ताप सामर्थ से उस नकारात्मक जला देते हैं और रोगी तत्काल ठीक होने लगता है ।
इस रोग शोधन की आध्यात्मिक शैव प्रक्रिया के परिणाम वैज्ञानिक देखते तो हैं, किन्तु आज तक कोई भी सही वैज्ञानिक कारण नहीं बतला पाये हैं ! यही है शिव की साधना शक्ति का चमत्कार !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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