शैव जीवन दर्शन मानता है कि “हर रोग अवचेतन का प्रगट स्वरूप है” ! अर्थात हमारे मन और शरीर के मध्य एक गहरा और अविभाज्य संबंध है।
अब आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी इस अवधारणा को ‘मनोदैहिक रोग’ के रूप में बतलाता है ! इसका मूल अर्थ यह है कि हमारे भौतिक शरीर पर जो भी व्याधियां या लक्षण दिखाई देते हैं, वह अक्सर हमारे गहरे अवचेतन में चल रहे मानसिक और भावनात्मक संघर्षों का ही स्थूल प्रगट स्वरूप है।
मतलब अवचेतन मन हमारी सभी दबी हुई भावनाओं, अनसुलझे आघातों, अज्ञात भय, विश्वासों और स्मृतियों का एक विशाल भंडार है। यह हमारे शरीर की स्वायत्त प्रणाली को भी नियंत्रित करता है, जिसमें हमारी श्वास, हृदय गति, पाचन और कोशिकाओं का निर्माण आदि शामिल है।
भावनाओं का दमन हर रोग की जड़ है ! जब हम क्रोध, भय, ईर्ष्या, या अपराधबोध जैसी किसी तीव्र नकारात्मक भावना को किसी से व्यक्त नहीं कर पाते हैं, और उसे अपने भीतर ही दबा लेते हैं, तो वह ऊर्जा नष्ट नहीं होती है । बल्कि वह ऊर्जा रूप में हमारे अवचेतन में संग्रहित हो जाती है।
जो हर क्षण हमारे जैविक प्रणाली और हार्मोन स्राव की प्रभावित करता रहता है ! अवचेतन मन में दबा हुआ यह संघर्ष शरीर को लगातार “लड़ो या भागो” की मन:स्थिति में रखता है। इसके परिणाम स्वरूप कोर्टिसोल और एड्रेनालाईन जैसे तनाव हार्मोन हमारे शरीर में निरंतर और अत्यधिक मात्रा में स्राव करते रहते हैं।
लंबे समय तक यह हार्मोनल असंतुलन ही शरीर के प्राकृतिक चक्रों और प्रतिरक्षा प्रणाली को बुरी तरह बाधित करते रहते हैं और अंततः जिस अंग पर सबसे अधिक दबाव पड़ता है, वह अंग स्वाभाविक कार्य करना बंद कर देता है ! फिर कुच्छ समय बाद वहाँ की यह नकारात्मक ऊर्जा एक ‘रोग’ के रूप में प्रगट होती है।
भारतीय दर्शन में भी माना जाता है कि सूक्ष्म शरीर (मन, भावनाएं) में जो भी हलचल होती है, वही अंततः स्थूल शरीर (भौतिक शरीर) में व्याधि बनकर उभरती है। इसी कारण मानसिक संयम और इन्द्रिय जय तप (इंद्रियों और मन पर नियंत्रण) को पूर्ण स्वास्थ्य के लिए किसी योग्य गुरु के सानिध्य में अवश्य करना चाहिये है।

