अपराध मनुष्य का स्वाभाविक गुण है ! अपराध या पाप का विचार प्रायः अज्ञान और अहंकार से उपजता है। इस मानसिक अवरोध से पार पाने के लिये शिव अनुगमन ही सर्वोच्च मार्ग है।
शिव, जो स्वयं परम कल्याण के प्रतीक हैं, उन्हीं का अनुगमन करके अहंकार के विसर्जन की एक गहन, तार्किक और भावनात्मक प्रक्रिया से प्रत्येक व्यक्ति अपराध बोध से मुक्त हो सकता है।
जब साधक अपनी समस्त वृत्तियों को उस परम चेतना को समर्पित कर देता है, तो उसका कर्तापन नष्ट हो जाता है और पाप का आधार ढह जाता है। यही अपराध बोध से मुक्त का मार्ग है !
जो व्यक्ति अपने ज्ञान, संसाधनों और जीवन की ऊर्जा को समाज के उत्थान के लिये लोक कल्याण के भाव से खपा देते हैं, वह मात्र सेवा नहीं करते बल्कि वह अपना आत्म शोधन भी करते हैं।
प्रज्ञा और सच्चे बोध के साथ जब व्यक्ति मन व इंद्रियों पर अनुशासन रखते हुए नि:स्वार्थ भाव से कर्म करता है, तब अतीत के समस्त पाप स्वतः भस्म हो जाते हैं।
शिव अनुगमन, तार्किक चिंतन और भावनात्मक समर्पण का यह अद्भुत संगम व्यक्ति को पश्चाताप की संकीर्णता से निकालकर सार्वभौमिक चेतना से जोड़ देता है।
अंततः, शिव अनुगमन और जनकल्याण का यह संयुक्त मार्ग प्रायश्चित के हर गरिष्ठ से गरिष्ठ भार को गलाकर कर आत्म चेतना को विकसित करता है।
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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