बौद्ध धर्म का दुर्भाग्य पूर्ण विभाजन : Yogesh Mishra

बुद्ध के निर्वाण के 100 वर्ष बाद ही आपसी कलह में बौद्ध धर्म दो सम्प्रदायों में विभक्त हो गया – महायान बनाम हीनयान ! यह दोनों बौद्ध धर्म की ही शाखाएं थीं !  हीनयान निम्न वर्ग के लिये और महायान उच्च वर्ग के लिये !

 हीनयान एक व्यक्तिवादी धर्म था ! इसका शाब्दिक अर्थ है बौद्ध धर्म निम्‍न मार्ग ! यह मार्ग केवल बौद्ध भिुक्षुओं के लिये ही था ! हीनयान संप्रदाय के लोग समाज परिवर्तन अथवा समाज सुधार के विरोधी थे ! यह बौद्ध धर्म के प्राचीन आदर्शों का ज्‍यों त्‍यों बनाए रखना चाहते थे ! हीनयान संप्रदाय के सभी ग्रंथ पाली भाषा मे लिखे गये हैं !

हीनयान बुद्धजी की पूजा भगवान के रूप मे न करके बुद्धजी को केवल महापुरुष मानते हैं ! हीनयान की साधना अत्‍यंत कठोर थी तथा वह बौद्ध भिक्षु ही अपने जीवन में अपना सकता था ! हीनयान संप्रदाय श्रीलंका, बर्मा, जावा आदि देशों मे फैला हुआ था ! बाद मे यह संप्रदाय भी दो भागों मे विभाजित हो गया- वैभाष्क एवं सौत्रान्तिक ! वैभाष मत की उत्‍पत्ति कश्‍मीर मे हुई थी तथा सौतांत्रिक मत तंत्र. मंत्र. बौद्ध कर्मकाण्ड आदि से संबंधित है ! सौतांत्रिक संप्रदाय का कर्मकाण्डीय सिद्धांत मंजू श्री मूल कल्‍प और गुहा सामाज नामक ग्रंथों में मिलता है !

महायान संप्रदाय समाज के सामान्य गृहस्थों के लिए और सामाजिक उन्नति का मार्ग निर्दिष्टक था ! महायान भक्ति प्रधान मत है ! इसी मत के प्रभाव से बुद्ध की मूर्तियों का निर्माण आंरभ हुआ था ! इसी मत ने बौद्ध धर्म में बोधिसत्व की भावना का समावेश किया !

यह भावना, सदाचार, परोपकार, उदारता आदि से सम्पन्न मत था ! अर्थात रुढ़िवादी नहीं था बल्कि विकसित आधुनिकता में विश्वास रखने वाला मत था ! इस मत के अनुसार ‘बुद्धत्व’ की प्राप्ति सर्वोपरि लक्ष्य है, न कि व्यर्थ के तंत्र मंत्र अनुष्ठान कर्मकाण्ड आदि !

इस मत ने बौद्ध विहारों में बौद्ध भिक्षुओं की तरह अय्याशी की जगह समाज में आधुनिक तरह से बौद्ध दर्शन के प्रचार प्रसार पर विशेष बल दिया !

आंबेडकर साहब इसी महायान संप्रदाय के समर्थक थे ! जिसने बुद्ध के महा निर्वाण के बाद बौद्ध विचार धारा को पूरी दुनियां में फैलाने का काम किया !!   

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

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