रावण का महल : Yogesh Mishra

श्रीलंका का त्रिकुट पर्वत जिसे अब सिगिरिया पर्वत कहा जाता है ! वहां पर रावण का महल था ! जिसे वामपंथी इतिहासकारों ने मिथ्या साबित करने में कोई कमी नहीं छोड़ी  !

आप बाल्मीकि रामायण के सुन्दर काण्ड में जैसे ही पढ़ेंगे कि रावण का महल त्रिकुट पर्वत पर स्थित था ! महल के चारों ओर घना जंगल था ! उसके महल तक पहुँचना आसान नहीं था ! तब आपके मस्तिष्क में श्रीलंका के सिगिरिया पर्वत का दृश्य स्वतः ही उपन्न हो जायेगा  ! पुरातात्विक साक्ष्यों और ऐतिहासिक ग्रंथो के आधार पर कुछ इतिहासकारों ने इसी पर्वत को रावण का निवास स्थान माना है !

        इस पवर्त के ऊपर आज महल के अवशेष हैं ! आसपास के खंडहर और गुफाओं को देखकर आप इसी निष्कर्ष पर आएंगे कि श्रीलंका के इतिहास में रावण के अलावा कोई और राजा ऐसा नहीं हो सकता जिसके पास इतना वैभवशाली महल बनवाने की क्षमता रही हो ! इस बात की पुष्टि न केवल श्रीलंका के जनमानस में फैले तमिल लोक गीतों में है ! बल्कि प्रसिद्ध इतिहासकार मिरांडा ओबेसकेरे की किताब भी करती है ! जिसमें उन्होंने पुरात्तात्विक साक्ष्य के आधार पर बतलाते हुए अपनी किताब “रावना, किंग ऑफ़ लंका” में यह लिखा है कि, “यूँ तो रावण का साम्राज्य मध्य श्रीलंका में, बदुल्ला, अनुराधापुरा, केंडी, पोलोन्नुरुवा और नुवारा एलिया तक फैला हुआ था मगर, रावण ख़ुद सिगिरिया पर्वत पर स्थित अपने सोने के महल में रहा करता था  !

पवर्त के सामने पत्थरों से निर्मित सिंह के दो विशाल पंजे इस महल के यौवन के दिनों की भव्यता को दर्शाते हैं  ! यह महल इतना सुरक्षित है कि यहां तक पहुँचने के लिये लोहे की आधुनिक सीढ़िया लगानी पड़ी ! पर्वत के नीचे कई गुफाएँ हैं ! यही वह गुप्त मार्ग थे जिनसे रावण विश्व के दूसरे द्वीपों में आवश्यकता पड़ने पर यात्रा कर सकता था ! जिनमें अब प्रवेश वर्जित है !

इसी महल के निकट रावण का व्यक्तिगत हवाई अड्डा था ! जिसमें सदैव हवाई जहाज उड़ान के लिए तैयार रहते थे और उनके ईधन की व्यवस्था भी उन हवाई अड्डों पर थी ! जिन ईधन गोदामों में हनुमान जी ने आग लगाकर उस हवाई अड्डे को तहस-नहस कर दिया था ! जिसे आज के कथावाचक हनुमान जी द्वारा लंका में आग लगाए जाने का वर्णन बतलाते हैं !

 लंका में रावण के महल से दक्षिण दिशा की ओर एक बहुत बड़ा भूभाग था ! जो एक तरफ ऑस्ट्रेलिया और दूसरी तरफ अफ्रीका से जुड़ा हुआ था ! जहां पर आज हिंद महासागर लहरा रहा है ! इस भूभाग में कुंभकरण की देख रेख में अनेकों वैज्ञानिक प्रयोगशाला में चला करती थी ! जिनके द्वारा सेटेलाइट छोड़ा जाना, एलियन से संपर्क करना, तरह-तरह के युद्ध में प्रयोग किये जाने वाले संचार साधनों और हथियारों का निर्माण करना, आधुनिक राडारों का आविष्कार करना, संदेश वाहन के लिए आधुनिकतम तरीके के संयंत्रों का निर्माण करना, नित नये उपग्रह छोड़ा जाना, तरह-तरह के अत्याधुनिक हथियारों का निर्माण करना, ज्योतिष, तंत्र आदि के नये सिद्धांतों की स्थापना के लिए तरह-तरह के यंत्रों और जन्त्रों का निर्माण करना !

जीव जंतुओं के नश्ल सुधार हेतु तरह तरह का अभियान चलाया जाना, नृत्य-कला के क्षेत्र में अपनी प्रजा को पारंगत करने के लिये वद्द्य यंत्रों का निर्माण करना ! अनेकों विश्वविद्यालयों का निर्माण करना, वेदों के समानांतर रक्ष संस्कृति के अनुरूप वेदों के निर्माण के लिए विद्वानों के शोध संस्थानों का निर्माण आदि कार्य हुआ करते थे ! जिसमें वैज्ञानिक विषयों पर कुंभकरण का अधिकार था और ज्ञान के क्षेत्र में जो कार्य हुआ करता था ! उसकी व्यवस्था रावण के पुत्र इंद्रजीत अर्थात मेघनाथ देखा करते थे !

अर्थात संक्षेप में कहा जाये तो रावण ने त्याग और तप पर आधारित “रक्ष संस्कृत” की स्थापना देवताओं के भोग विलास आधारित “यक्ष संस्कृति” के विपरीत की थी ! जिसका मुख्यालय रावण का महल था और कार्य क्षेत्र समस्त लंका हुआ करती थी ! जिसे राम ने युद्ध के दौरान सैकड़ों परमाणु हमलों के द्वारा नष्ट करके हिंद महासागर में डुबो दिया था ! जिससे “रक्ष संस्कृति” का ज्ञान ही नहीं उनका अनुसंधान भी इस युद्ध में नष्ट हो गया ! जो मानवता के लिये बहुत बड़ी हानि थी !!

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

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मोबाईल : 9453092553

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