तंत्र ही सृष्टि का आनादि और प्राचीनतम ज्ञान है : Yogesh Mishra

तंत्र को मूलत: भगवान शिव द्वारा माता पार्वती को बतलायी गयी वह गुप्त विद्ध्य है जिसके द्वारा व्यक्ति अपनी आत्मा और बुद्धि को बंधन मुक्त कर के शरीर और मन को शुद्ध कर लेता है ! शैव तंत्र की उपयोगिता के देखते हुये इसे ब्रह्म संस्कृति वालों ने भी अपनाया और इस तरह इसका उल्लेख अथर्ववेद में भी पाया जाता है ! यह ईश्वर की अनुभूति का अनुभव करने में सहायक होता है !

तंत्र की प्रक्रिया से हम भौतिक और आध्यात्मिक जीवन की हर समस्या को हल कर सकते हैं ! यह सत्य है कि एक व्यक्ति तंत्र की सही प्रक्रिया से मष्तिष्क का पूरा इस्तेमाल कर अद्भुत शक्तियों के स्वामी बन जाता है !

तंत्र में सृष्टि, लय, मन्त्र, निर्णय, ज्योतिष, शौच-अशौच, स्त्री पुरुष के लक्षण, व्यवहार तथा आध्यात्मिक नियमों का मुख्यतः वर्णन होता है !

वैष्णव की अंधी दौड़ के कारण यह पृथ्वी 25,000 वर्षों तक निरंतर शैवों के विरुद्ध शाररिक और मानसिक युद्ध झेलती रही ! परिणाम: शैव तंत्र साहित्य विस्मृति के चलते विनाश और उपेक्षा का शिकार हो गया है ! अब तंत्र के अनेक ग्रंथ लुप्त हो चुके हैं !

किन्तु फिर भी वर्तमान में प्राप्त सूचनाओं के अनुसार 199 तंत्र ग्रंथ उपलब्ध हैं ! शैवों द्वारा तंत्र का विस्तार ईसा पूर्व से तेरहवीं शताब्दी तक बड़े प्रभावशाली रूप में भारत, चीन, तिब्बत, थाईदेश, मंगोलिया, कंबोज आदि देशों में रहा !

इसीलिये तंत्र को तिब्बती भाषा में ऋगयुद्ध भी कहा जाता है ! जिसका विभ्रंश नाम ऋगयुग बाद में समस्त ऋगयुद पड़ा !

जिसमें प्राप्त साहित्य के 78 भाग हैं ! जिनमें 2640 स्वतंत्र ग्रंथ हैं ! इनमें कई ग्रंथ भारतीय तंत्र ग्रंथों का अनुवाद है और कई तिब्बती तपस्वियों द्वारा रचित ग्रन्थ हैं ! नाद और नृत्य भी तंत्र का ही अंग है ! सभी साधना पद्ध्यातियों की उत्पत्ति तंत्र से ही हुयी है !

यही तंत्र के प्रचीनता का प्रमाण है !!

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

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मोबाईल : 9453092553

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