पौराणिक शब्दों के मोह ने हिंदुत्व के विकास को रोक रखा है : Yogesh Mishra

 हिंदू धर्म में बहुत से ऐसे शब्द हैं, जिनके विषय में हिंदू यह मानकर चलता है कि यह अंतिम निष्कर्ष का शब्द है ! अब इसमें किसी भी पुनर्विचार की आवश्यकता नहीं है ! जैसे सत्य, तप, त्याग, प्रारब्ध, सुर, असुर, ब्रह्मचर्य, गुरुकुल, गीता, भगवत, भक्ति, आदि आदि !

और यदि कोई व्यक्ति उन शब्दों पर पुनर्विचार करने की बात कहता है, तो रूढ़िवादी हिंदू समाज के नेता उसे नास्तिक, बुद्धिहीन, पापी, धर्म विरोधी आदि कहकर उसके प्रस्ताव को अस्वीकार कर देते हैं !

 इसी वजह से हिंदू धर्म के प्रति लोगों की सोच समझ का विस्तार रुक जाता है क्योंकि आप इस संसार में अब किसी भी व्यक्ति को मात्र तर्क के आधार पर ही प्रभावित कर सकते हैं और उसे हिंदू मान्यताओं को मानने के लिए प्रेरित कर सकते हैं !

 मनुष्य के विकसित होते समाज में ज्ञान के बढ़ने के साथ-साथ तर्क के परंपरागत मानक में भी काफी विकास हुआ है ! जो अब शास्त्र सम्मत ज्ञान से बहुत आगे है ! इसलिए शास्त्रों को प्रमाण मानकर शास्त्रों के ज्ञान तक ही सीमित रह जाना ही अब हिन्दुओं के सर्वनाश का कारण बन रहा है !

 इसीलिए आज जो आधुनिक विज्ञान हिंदू धर्म ग्रंथों के शब्दों के विश्लेषण से शुरू हुआ था, वही आज विज्ञान के विकसित होने के बाद वह हिंदू धर्म ग्रंथों के लिए चुनौती बन रहा है !

 अतः यदि हिंदू धर्म की मान्यताओं को सतत विकसित करते रहना है, तो हिंदू विचारकों, मनीषियों,  दार्शनिकों और धर्म का प्रचार प्रसार करने वाले कथा वाचकों को शास्त्र के आगे बढ़कर मनुष्य के विकसित बुद्धि के अनुसार नये संभावनाओं पर विचार करना होगा !

 अन्यथा तर्क के आधार पर विकसित होने वाली नई पीढ़ी आपके धर्म को रूढ़िवादी मांन कर अस्वीकार कर देगी, जो अब स्पष्ट होता दिखाई दे रहा है !

 इसलिए धर्म ग्रंथों को नये सिरे से नये बौद्धिक चतुर्यीय विश्लेषण के साथ नये तर्क मानकों को लेते हुए  अतिरिक्त ग्रंथ के रूप में लिखना होगा ! जो कार्य हमारे ही धर्म गुरुओं को समय रहते करना चाहिए ! आदि गुरु शंकराचार्य ने इसी कार्य को करने के लिए शारदा पीठ की स्थापना की थी ! जिसे कालांतर में उत्तराधिकारी शंकराचार्य नहीं चला पाये !

 लेकिन हिंदुओं का यह दुर्भाग्य है कि हमारे धर्म गुरु हजारों साल पुराने धर्म ग्रंथों को ही प्रमाण मानकर उनके विश्लेषण करने में लगे हुये हैं अर्थात दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि हमारे धर्मगुरु यह मान चुके हैं कि अब हजारों साल से हिंदू मानव मस्तिष्क में कोई विकास नहीं किया है !

 जो धर्म ग्रंथ हजारों साल पहले लिख दिये गये ! उसके बाद हिंदुओं ने धर्म पर विचार करना छोड़ दिया है ! अत: अब उन पर किसी भी पुनर्विचार की कोई आवश्यकता नहीं है और यदि हिंदू मानव मस्तिष्क ने हजारों साल में अपने धर्म को विकसित करने पर कोई विचार ही नहीं किया है, तो हिन्दुओं का सर्व नाश तो सुनिश्चित होगा ही ! इसीलिये हिंदू धर्म क्षय की गति को प्राप्त हो चुका है !

 इसलिये आज धर्म की रक्षा के लिए हिंदू धर्म गुरुओं को नैतिकता के आधार पर आगे आकर जिम्मेदारी उठानी चाहिए ! जिसके लिए उन्होंने भगवा धारण किया है ! अन्यथा यह पौराणिक शब्दों से मोह हिंदू धर्म के सर्वनाश का कारण बनेगा !!

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

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