प्रायः यह अवधारणा है कि जो व्यक्ति भक्त होता है वह धार्मिक भी होता है लेकिन यह अवधारणा अनादि काल से अस्वीकार्य है क्योंकि प्राचीन काल में भी यह माना गया कि जिस व्यक्ति ने धर्म के लक्षणों को स्वीकार नहीं किया है वह चाहे जितनी भक्ति कर ले कभी भी धार्मिक नहीं हो सकता है !
महर्षि मनु ने धर्म के दस लक्षण बतलाये हैं :-
धृति: क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह: !
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ! ! (मनुस्मृति 6.92)
अर्थ – धृति (धैर्य ), क्षमा (अपना अपकार करने वाले का भी उपकार करना ), दम (हमेशा संयम से धर्म में लगे रहना ), अस्तेय (चोरी न करना ), शौच ( भीतर और बाहर की पवित्रता ), इन्द्रिय निग्रह (इन्द्रियों को हमेशा धर्माचरण में लगाना ), धी ( सत्कर्मों से बुद्धि को बढ़ाना ), विद्या (यथार्थ ज्ञान लेना ). सत्यम ( हमेशा सत्य का आचरण करना ) और अक्रोध ( क्रोध को छोड़कर हमेशा शांत रहना ) ! यही धर्म के दस लक्षण है !
इसी तरह याज्ञवल्क्य जी ने भी धर्म के नौ लक्षण बतलाये हैं :
अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह: !
दानं दमो दया शान्ति: सर्वेषां धर्मसाधनम् ! ! (याज्ञवल्क्य स्मृति १.१२२)
(अहिंसा, सत्य, चोरी न करना (अस्तेय), शौच (स्वच्छता), इन्द्रिय-निग्रह (इन्द्रियों को वश में रखना), दान, संयम (दम), दया एवं शान्ति)
इसी तरह महाभारत के महान यशस्वी पात्र विदुर ने भी धर्म के आठ अंग बतलाये हैं –
इज्या, अध्ययन, दान, तप, सत्य, दया, क्षमा और अलोभ !
उनका कहना है कि इनमें से प्रथम चार इज्या आदि अंगों का आचरण मात्र दिखावे के लिए भी हो सकता है, किन्तु अन्तिम चार सत्य आदि अंगों का आचरण करने वाला महान बन जाता है !
अर्थात कहने का तात्पर्य यह है कि भक्ति धर्म का हिस्सा नहीं है ! जब बौद्ध धर्मियों ने सनातन धर्म को नष्ट करने का प्रयास किया और सनातन मंदिरों और गुरुकुलों को छीन कर वहां पर बौद्ध मठों की स्थापना कर दी ! तब पहली बार आदि गुरु शंकराचार्य ने समाज को धर्म से जोड़ने के लिए भक्ति आंदोलन की शुरुआत की !
इस तरह भक्ति आंदोलन के प्रथम प्रचारक और संत आदि गुरु शंकराचार्य जी थे ! जो केरल में आठवीं शताब्दी में जन्मे थे ! संत शंकराचार्य द्वारा भारत में व्यापक स्तर पर भक्ति मत को ज्ञानवादी रूप में प्रसारित किया गया !
फिर 8वीं से 10वीं शताब्दी में दक्षिण भारत में भक्ति का उदय उन कविताओं के रूप में हुआ, जिनकी रचना अलवारों और नयनारों ने क्रमश: भगवान विष्णु और शिव के लिए तमिल में की थी !
बारहवीं शताब्दी के प्रारंभ में रामानंद द्वारा यह आंदोलन दक्षिण भारत से उत्तर भारत में लाया गया ! इस आंदोलन को चैतन्य महाप्रभु, नामदेव, तुकाराम, जयदेव ने और अधिक मुखरता प्रदान की ! भक्ति आंदोलन का उद्देश्य था- हिन्दू धर्म एवं समाज में सुधार तथा इस्लाम एवं हिन्दू धर्म में समन्वय स्थापित करना !
इस तरह यह सिद्ध होता है कि भक्ति सनातन धर्म का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह एक विशुद्ध आंदोलन का हिस्सा है ! इसलिए जब तक धर्म के मार्ग पर चलकर व्यक्ति साधना नहीं करता है, तब तक उसे मात्र भक्ति से कुछ भी प्राप्त नहीं हो सकता है !
किंतु वर्तमान समय में भक्ति को प्रोत्साहित करने का कार्य भी अब व्यवसाय हो गया है ! जो कथा वाचक खुले आम मंच पर बैठकर कर रहे हैं ! इसलिए आम समाज में यह भ्रम व्याप्त हो गया है कि भक्ति धर्म का हिस्सा है जबकि वास्तव में ऐसा नहीं है !
भक्ति को सनातन धर्म का अंग बतला कर उसे कथावाचकों द्वारा अपने निजी लाभ के लिये सनातन धर्म से जोड़ देना ही सनातन धर्म के सर्व नाश का कारण है !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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