इसमें कोई शक नहीं है कि आज अधिकांश सनातन धर्मी वैष्णव जीवन शैली का अनुगमन करते हैं ! लेकिन यह सनातन धर्मी वैष्णव जीवन शैली का अनुगमन करने के चक्कर में खुद तो पथभ्रष्ट हो ही गये हैं ! साथ ही इन्हीं लोगों की वजह से आज विधर्मियों को भी सनातन धर्म के उपहास का अवसर मिल जाता है !
और ऐसा हो भी क्यों न क्योंकि वैष्णव जीवन शैली पूरी तरह से प्रपंच आश्रित आडम्बरी जीवनशैली है ! इसमें मात्र कर्मकाण्ड के लिये अस्सी हजार मन्त्र हैँ, जो बस सिर्फ ब्रह्मचारी के लिए निर्मित हैँ ! उपासना के लिये सोलह हजार मन्त्र हैँ, जो बस सिर्फ गृहस्थों के लिए हैँ और ज्ञान मर्गियों के लिये मात्र चार हजार मन्त्र हैँ, जो बस सिर्फ सन्यासियोँ के लिए है !
वेदान्त का ज्ञान विरक्त के लिए बतलाया जाता है ! अब यह बात अलग है कि अब तथाकथित वैष्णव विरक्त साधक भगवा कपड़े पहन कर अपने निजी लाभ के लिए शासन सत्ता की दलाली करते नजर आते हैं और शासन सत्ता के वरिष्ठ पदाधिकारियों की चाटुकारिता में अपने भगवा कपड़े का सम्मान भी खो देते हैं !
अनुभव में यह आया है कि यह प्रपंची वैष्णव वेदो ने ईश्वर के स्वरुप का वर्णन तो करते हैं, पर बचपन से लेकर बुढ़ापे तक वेदों को रटते रटते आज तक कोई भी वैष्णव प्रपंची उस ईश्वर को पा नहीं सका है !
और जब इनके समझ में कुछ नहीं आता है तो यह कहने लगते हैं कि वेदोँ के मन्त्र केवल शब्दरुप नहीँ है, बल्कि प्रत्येक मन्त्र ऋषि हैँ, देव हैँ ! वेदमन्त्र के देव तपश्चर्या करके थक हार गये फिर भी उनका ब्रह्म सम्बन्ध नहीँ हो पाया ! तो मेरी क्या औकात है ?
अर्थात कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह है कि वैष्णव धर्म प्रपंचियों ने सनातन जीवन शैली का अनुगमन करने वाले सरल और सीधे लोगों को स्वर्ग और मोक्ष्य का प्रलोभन देकर उन्हें भटका दिया और अब जब विज्ञान विकसित हो गया तो यह अपने किसी भी सिद्धांत को विज्ञान की कसौटी पर खरा सिद्ध नहीं कर पा रहे हैं !
इसलिए विधर्मियों को वैष्णव धर्म प्रपंचियों द्वारा फैलाए गये तथाकथित सनातन हिन्दू धर्म पर हंसने का अवसर मिलता है !
इस समस्या का समाधान सनातन धर्म शास्त्र के गूढ़ रहस्यों को समझ कर स्वयं हिंदू ही कर सकता है ! इसमें कोई भी पंडित, मंदिर, मजीरा, ढोलक प्रसाद आदि इस समस्या का समाधान करने में सक्षम नहीं है !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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