भाग्यवादी आदमी कभी भी पुरुषार्थवान नहीं हो सकता है और कथावाचक व्यक्ति को ईश्वरवादी कम भाग्यवादी अधिक बना देते हैं !
जो लोग बहुत भगवान की कृपा प्राप्त करने के लिये बहुत अधिक कथा आदि सुनते हैं, उनकी दृष्टि इस तरह से विकसित हो जाती है कि ईश्वर की कृपा के बिना संपन्न होना संभव नहीं है ! जबकि सम्पन्नता सांसारिक लोक व्यवहार और युक्ति का विषय है !
अतः उन्हें अपनी जो ऊर्जा संपन्नता को विकसित करने में लगानी चाहिए, वह उस उर्जा का इस्तेमाल मंदिर, व्रत, ढोलक, मजीरा आदि में लगा देते हैं !
ईश्वर ने मानव मस्तिष्क को इस तरह से निर्मित किया है कि व्यक्ति जो चाहे वह ईश्वर से पा सकता है !
और यदि व्यक्ति का मस्तिष्क स्पष्ट रूप से प्रकृति को कोई भी निर्देश को नहीं देता है, तो प्रकृति उस व्यक्ति की वह आवश्यकता कभी पूरी नहीं करती है !
अत: यदि आप आर्थिक रूप से परेशान हैं, तो प्रकृति से स्पष्ट रूप से मदद मांगना चाहिए ! न कि किसी भगवान, बाबा, ज्योतिषी या कथा वाचक से !
लेकिन कथावाचक आदि अपने धंधे को विकसित करने के लिये आपके मस्तिष्क को अनावश्यक रूप से भक्ति के लिये प्रशिक्षित करते हैं और आपको भगवान वादी बना देते हैं ! जिसके प्रभाव से आपके मस्तिष्क में इतना भ्रम पैदा हो जाता है कि आप ईश्वर के स्थान पर कथावाचक द्वारा बतलाये गये भगवान में विश्वास करने लगते हैं !
और यहीं से आपकी संपन्नता का सारा खेल बिगड़ने लगता है !
और कथावाचक आपको भगवान भरोसे इसलिए बैठाता है कि आप जब भगवान के भरोसे रहेंगे तब आप अपनी गरीबी के लिये किसी और को जिम्मेदार समझते हैं ! जैसे भाग्य भगवान पूर्व कर्म आदि और आप धन कमाने की सांसारिक युक्तियों से मुंह मोड़ लेते हैं !
और समाज में कथावाचक का धंधा चलता रहता है इसलिए कथावाचक कभी भी यह नहीं चाहते हैं कि समाज धन अर्जन की वास्तविक क्रिया को जानकर व्यक्ति संपन्न हो !
क्योंकि संपन्न व्यक्ति के पास कथावाचन आदि सुनने या करवाने का समय ही नहीं रहता है ! जिससे इन कथावाचकों का धंधा कमजोर पड़ जाता है !
इसलिए अगर जीवन में संपन्न होने की इच्छा है, तो इन भ्रमित करने वाले कथावाचकों के प्रपंच से दूर रहिए और अपने पुरुषार्थ से अर्जित संपत्ति का उपयोग अपने परिवार के लिए कीजिए !
यह भी संपन्नता का ही एक सूत्र है !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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