वैष्णव धर्म के कथावाचक दुकानदारों ने अपना धंधा चलाने के लिए यह एक आम अवधारणा विकसित की है, कि “भक्ति धर्म का अनिवार्य अंग है !” और भक्ति से ईश्वर तथा मोक्ष की कृपा प्राप्त होती है ! जब कि यह अवधारणा सरासर झूठ है !
भक्ति कभी भी धर्म का हिस्सा नहीं रही है !
धर्म के 10 लक्षण जो हमारे शास्त्रों में वर्णित हैं, उनमें भक्ति को कोई स्थान नहीं दिया गया है !
धैर्य, 2. क्षमा, 3. संयम, 4. अस्तेय अर्थात चोरी न करना, 5. शौच अर्थात स्वच्छता, 6. इंद्रिय-निग्रह अर्थात इंद्रियों को वश में रखना, 7. बुद्धि, 8. विद्या, 9. सत्य, और 10. अक्रोध, क्रोध न करना
यह सभी लक्षण मनुस्मृति के 6.92 में तथा महाभारत जैसे समग्र ग्रंथों में बतलाये गये हैं !
इन धर्म के 10 लक्षणों में भक्ति कहीं नहीं है !
वास्तव में भारत में भक्ति प्रथा की शुरुआत आठवीं सदी से हुई थी ! जिसे दक्षिण भारत के आलवार और नयनार संतों ने रामानुजाचार्य के नेतृत्व में आरम्भ किया था ! कालांतर में बारहवीं शताब्दी के प्रारंभ में रामानंद ने इस प्रथा को दक्षिण भारत से उत्तर भारत सूफी संतों के आक्रमण (मुग़ल जासूसों से देश को बचाने के लिये ) उत्तर भारत के हिदू समाज में लाये !
बाद को यह भक्ति प्रथा अनेक संतों के जीवकोपार्जन का साधन बन गयी ! क्योंकि भक्ति करने वाले संतों को समाज विशेष सम्मान की दृष्टि से देखा था और उन्हें समय-समय पर आर्थिक सहायता भी प्रदान करता था !
इस हेतु समय-समय पर यह बड़े-बड़े संतों के द्वारा पोषित किया जाने लगा ! जो प्रथा आज भी साधु, संत, कथा वाचक तथा बड़े बड़े मठ मंदिर के महंत अपने जीवन निर्वाह को जारी रखे हुये है ! क्योंकि भक्ति धन अर्जन का अच्छा माध्यम है !
अनुभव में यह आया है कि इस वैष्णव भक्ति से प्राप्त कुछ नहीं होता है, बल्कि व्यक्ति इस वैष्णव भक्ति के कारण अपना पुरषार्थ करना भी छोड़ देता है और आर्थिक सर्वनाश को प्राप्त होता है !
धीरे धीरे भक्ति के प्रभाव में हिन्दू समाज पुरुषार्थ विहीन हो गया और या कपोल कल्पित भक्ति ही आज हिंदू समाज के सर्वनाश का कारण बन गया है !
जबकि भगवान शिव स्पष्ट रूप से कहते हैं कि मुझे भक्ति पसंद नहीं, मैं अपना अनुगमन करने वाले को पसंद करता हूं !
अर्थात
ईश्वर भक्ति के कारण किसी पर कृपा नहीं करता है बल्कि अपनी वृत्ति में सुधार करके व्यक्ति को ईश्वर की कृपा प्राप्त करनी पड़ती है !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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