अंधभक्त वैष्णव इस लेख से दूर रहें, यह प्रबुद्ध वर्ग के लिये लिखा गया है !
इल्युमिनाटी का अर्थ है “प्रबुद्ध” या “ज्ञानवान”। इसके प्रमुख पर्यायवाची शब्द कुलीन वर्ग, अभिजात वर्ग, श्रेष्ठजन, विद्वान, प्रबुद्धजन हैं। शास्त्रों के अनुसार इल्युमिनाटी समाज की स्थापना असुर आचार्य शुक्राचार्य ने की थी ! जिसके अनेकों शोधगत प्रमाण हमारे शास्त्रों में मिलते हैं !
जबकि इस शब्द का प्रयोग ऐतिहासिक रूप से 18वीं सदी में एक गुप्त संगठन के लिए इस्तेमाल किया गया था।
महर्षि भृगु के पुत्र, भार्गव शुक्राचार्य मात्र एक पुरोहित नहीं थे, बल्कि वह एक महान नीतिकार, रणनीतिकार और दार्शनिक थे। उन्होंने दैत्यों और दानवों (असुरों) को केवल युद्ध कला ही नहीं सिखाई, बल्कि उन्हें राज्य-संचालन, अर्थशास्त्र और अध्यात्म का भी गहन ज्ञान दिया। असुरों में कई ऐसे राजा हुए जो अत्यंत प्रबुद्ध, धर्मनिष्ठ, न्यायप्रिय और समर्थवान थे।
राजा बलि अत्यंत पराक्रमी, सत्यवादी, प्रबुद्ध और और महान दानी थे। वह प्रह्लाद के पौत्र और विरोचन के पुत्र थे। वह इतने धर्मनिष्ठ थे कि देवता भी उनके पुण्य प्रताप से भयभीत रहते थे।
शुक्राचार्य के मार्गदर्शन और परामर्श पर उन्होंने तीनों लोकों के पराक्रमी, सत्यवादी और धर्मनिष्ठ असुर राजाओं का एक समूह बना कर “विश्वजित यज्ञ” आयोजित करवाया ! यही इल्युमिनाटी का प्रथम गठन था !
इस विश्वजित यज्ञ में विष्णु के छल के कारण परम ज्ञानी आचार्य शुक्राचार्य को अपनी एक आँख गवानी पड़ी ! यह दृष्टांत (शुक्राचार्य का कमंडल में बैठना और कुशा से आँख फूटना) मुख्य रूप से ‘वामन पुराण’, ‘स्कंद पुराण’, और बाद में भागवत पुराण की टीकाओं में प्राप्त होता है।
शुक्राचार्य की यही एक आंख आज इल्युमिनाटी का सिम्बल है ! इसके आगे के प्रमाणित शोध को यदि पढ़ना चाहते हैं तो कमेन्ट कीजिये !
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
कुण्डली परामर्श हेतु सम्पर्क कीजिये
मोबाईल : 9453092553
