शुक्राचार्य का ‘असुर दर्शन’ और आधुनिक ‘इल्युमिनाटी’ की कार्यप्रणाली एक ही धुरी पर घूमते हैं ! दोनों ही भौतिक जगत पर अपना पूर्ण और निर्विवाद नियंत्रण चाहते हैं।
‘असुर’ आचार्य शुक्राचार्य का सिद्धांत शुद्ध भौतिकवाद है और आधुनिक ‘इल्युमिनाटी’ की कार्यप्रणाली भी शुद्ध सांसारिक संसाधनों पर नियंत्रण करने की है !
वैदिक निर्वचन के अनुसार, ‘असु’ का अर्थ है—प्राण, जीवन शक्ति, या भौतिक अस्तित्व। जो इस ‘असु’ (भौतिक जीवन) में रमण करते हैं, उसे ही सर्वोच्च मानते हैं और उसे हर कीमत पर पुष्ट करना चाहते हैं, वही ‘असुर’ कहलाते थे।
शुक्राचार्य का दर्शन यह नहीं कहता कि असुर ‘बुरे’ हैं; वह यह कहते हैं कि जीवन का मूल उद्देश्य इस भौतिक दुनिया के संसाधनों का अधिकतम विजय और उस पर नियंत्रण प्राप्त करना है। इसीलिये शुक्र को भोग विलास का ग्रह भी माना जाता है !
आधुनिक युग में इल्युमिनाटी के वैश्विक सत्ता का भी यही मूल मंत्र है। उनका ध्यान परलोक, आत्मा या ‘बृहस्पति’ के त्यागवादी दर्शन पर नहीं है। उनका पूरा फोकस इसी जीवन में, इसी पृथ्वी पर, पूंजी, संसाधनों और मानव संपदा पर एकाधिकार स्थापित करने पर है।
शुक्राचार्य जानते थे कि देवों को पराजित करने के लिए असुरों को आर्थिक रूप से अजेय होना होगा। आधुनिक युग में, जिसे हम इल्युमिनाटी की कार्यप्रणाली कहते हैं, वह भी सेनाओं से ज्यादा ‘बैंकिंग प्रणाली’ और ‘फिएट करेंसी’ पर नियंत्रण रखती है।
आज के समय में अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार के उतार-चढ़ाव, भू-राजनीतिक स्थिरता और ऋण प्रणालियों पूरी तरह से इल्युमिनाटी के नियंत्रण में है, इसीलिये वही वास्तविक सत्ताधीश हैं। सरकार किसी की भी हो पर वैश्विक नियंत्रण इन्हीं का होता है !
यदि दोनों के कार्य प्रणाली में अन्य समानता भी जानना चाहते हैं तो हमें कमेन्ट कीजिये !
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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