जीवन का असली मर्म न तो खुद को एक मशीन की तरह पीसने में है और न ही हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने में है। अक्सर हम जीवन को दो अतियों में बाँट देते हैं, या तो हम किसी के थोपे गये कठोर और दमघोंटू अनुशासन में खुद को खो देते हैं, या फिर ‘आराम’ के नाम पर पूरी तरह से अकर्मण्य (निष्क्रिय) हो जाते हैं।
यदि व्यक्ति को केंद्र में रखकर देखा जाए, तो एक सार्थक, सुखी और स्वस्थ जीवन इन दोनों अतियों के बीच संतुलन साधने में ही छिपा है।
अति पराधीन अनुशासन में जीने से जीवन में बहुत तरह की हानियाँ होती हैं ! जैसे जब इंसान सुबह से रात तक सिर्फ दूसरों के तय किये गये ‘टाइमटेबल’ या लक्ष्यों के पीछे भागता है, तो उसके जीवन और विचारों की मौलिकता खत्म हो जाती है। वह लकीर का फकीर बन जाता है।
हर मिनट का हिसाब रखना और खुद पर हद से ज्यादा सख्ती करना व्यक्ति को अंदर से सिद्धांतवादी कम खोखला अधिक कर देता है। जीवन एक उत्सव है इसे अंतहीन बोझ में मत बदलिये, इसीसे अवसाद और चिंता का जन्म होता है।
मानव शरीर एक जीवंत इकाई है, मशीन का पुर्जा नहीं है । अति-अनुशासन में व्यक्ति अपनी भावनाएं, शौक, अपनों का साथ और आत्म-संतुष्टि को दरकिनार कर देता है। अंततः, सफलता मिलने पर भी उसे खुशी नहीं मिलती क्योंकि जिनके साथ ख़ुशी का अहसास होता है, वह सम्बन्ध तब तक नहीं बचते ।
दूसरी ओर, इस तनाव से बचने के लिए कुछ लोग ‘आराम से जीने’ का गलत अर्थ निकाल लेते हैं और अकर्मण्य हो जाते हैं। बिना उद्देश्य और कर्म के भी जीवन विनाशकारी हो जाता है !
जिस तरह इस्तेमाल न होने पर लोहे में जंग लग जाता है, उसी तरह बिना कर्म के व्यक्ति की मानसिक और शारीरिक क्षमताएं भी क्षीण होने लगती हैं। आपका शरीर बीमारियों का घर बन जाता है और दिमाग कुंद हो जाता है।
जब इंसान कोई उत्पादक कार्य नहीं करता, तो धीरे-धीरे उसका खुद पर से विश्वास उठने लगता है। खालीपन उसे हीन भावना और नकारात्मक सोच से भर देता है।
जो व्यक्ति कर्म नहीं करता, वह अंततः अपनी आर्थिक और सामाजिक जरूरतों के लिए दूसरों का मोहताज हो जाता है। यह निर्भरता ही सबसे बड़ा मानसिक कष्ट तो बनती ही है, साथ ही आत्म सम्मान की इच्छा को भी नष्ट कर देती है।
व्यक्ति को आपका लक्ष्य ‘स्वाधीन अनुशासन’ के साथ सहजता से जीना होना चाहिए। इसे जीवन में उतारने के कुछ व्यावहारिक तरीके मैं बतला रहा हूँ :-
आराम और आलस में फर्क समझें:
कड़ी मेहनत के बाद शरीर और मन को तरोताजा करने के लिए लिया गया समय ‘आराम’ है। लेकिन काम करने की ऊर्जा और समय होने के बावजूद काम से जी चुराना ‘अकर्मण्यता’ है। आराम आपको नई ऊर्जा देता है, जबकि आलस आपकी ऊर्जा सोख लेता है।
नियम अपने लिए बनाएं, खुद को नियमों के लिए नहीं:
अनुशासन ऐसा होना चाहिए जो आपके जीवन को सरल बनाए, न कि जटिल। काम के घंटे तय करें, लेकिन खुद को रोबोट न बनाएं। अगर किसी दिन काम करने का मन नहीं है, तो बिना आत्मग्लानि के खुद को ब्रेक दें।
रुचि और उद्देश्य से जुड़ें:
जब आप अपनी पसंद का काम करते हैं या आपके काम के पीछे कोई सार्थक उद्देश्य होता है, तो वह बोझ नहीं लगता। उसमें सहजता होती है और आप बिना थके, खुशी-खुशी उसे कर पाते हैं।
वर्तमान का आनंद लें:
भविष्य की अत्यधिक चिंता में वर्तमान की शांति न खोएं। अपना कर्म पूरी ईमानदारी से करें, लेकिन परिणाम को लेकर खुद पर हावी होने वाला तनाव न पालें।
जीवन एक बहती हुई नदी की तरह है। यदि इसे बहुत संकरी जगह (अति कठोर अनुशासन) से गुजारा जाए, तो यह उग्र हो जाती है और कटान करती है; और यदि इसे पूरी तरह खुला छोड़ दिया जाए (अकर्मण्यता), तो यह दलदल बन जाती है। इसलिए, जीवन में सहजता से बहें, किनारों का लचीला अनुशासन रखें और निरंतर आगे बढ़ते रहें। मेरा आशीर्वाद और मार्गदर्शन आपके साथ है !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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