जीवन में सुख और शांति का यह एक अत्यंत गूढ़ और यथार्थवादी सूत्र है। जब कोई व्यक्ति किसी कट्टर सामाजिक या धार्मिक समूह (जिसे यहाँ ‘गिरोह’ की संज्ञा दी गई है) का हिस्सा बनता है, तो वह अनजाने में अपनी बौद्धिक और आध्यात्मिक स्वतंत्रता को गिरवी रख देता है।
किसी भी समूह का एक निर्धारित ढांचा, मान्यताएँ और नियमावली होती है। उस समूह का सदस्य बनने के बाद व्यक्ति को अपनी स्वतंत्र सोच को दबाकर समूह की विचारधारा को अपनाना पड़ता है। तर्क और वैज्ञानिक दृष्टिकोण की जगह अंधविश्वास को न चाहते हुये भी स्वीकारना पड़ता है।
जिससे व्यक्ति अपने जीवन और निर्णयों का नेतृत्व करने के बजाय, किसी समूह या विचारधारा का अनुयायी बनकर रह जाता है। मालिक बनने के बजाय सेवक या कार्यकर्ता की यह मानसिक स्थिती व्यक्ति में अशांति और कुंठा का एक बड़ा कारण है।
सामाजिक और धार्मिक गिरोह अक्सर अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए एक ‘दुश्मन’ या विरोधी गुट का निर्माण करते हैं। इससे समाज में अनावश्यक ध्रुवीकरण होता है और व्यक्ति अनजाने ही किसी न किसी मानसिक या सामाजिक युद्ध का हिस्सा बन जाता है।
जब व्यक्ति किसी समूह से गहराई से जुड़ता है, तो वह अन्य विचारधाराओं के प्रति असहिष्णु हो जाता है। यह बाहरी टकराव और घृणा कभी भी व्यक्तिगत सुख और शांति को पनपने नहीं देते।
कई धार्मिक और सामाजिक समूह अपने सदस्यों को नियंत्रित करने के लिए भय, अपराधबोध और सामाजिक बहिष्कार के डर का इस्तेमाल करते हैं। इस तरह के वातावरण में रहने से व्यक्ति के व्यवहार में निरंतर तनाव रहता है, जो उसके तंत्रिका तंत्र और मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डालता है।
देखा गया है कि भीड़ में व्यक्ति का अपना विवेक शून्य हो जाता है। वह सामूहिक दबाव में ऐसे कार्य या निर्णय भी कर गुजरता है, जिन्हें वह व्यक्तिगत स्तर पर कभी सही नहीं मानता है।
सच्चा आध्यात्मिक विकास और व्यावहारिक ज्ञान हमेशा स्व-अनुभव और शोध पर आधारित होता है। समूह आपको एक ‘पैकेज्ड’ सत्य थमा देते हैं, जिससे जीवन की वास्तविक खोज वहीं रुक जाती है।
समूह के आयोजनों, विवादों, और शक्ति-प्रदर्शनों में व्यक्ति की वह अमूल्य ऊर्जा और समय नष्ट हो जाता है, जिसे वह आत्म-निर्माण, कौशल विकास या आत्मनिर्भर जीवन शैली विकसित करने में लगा सकता था।
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और उसे सहकार्यता की आवश्यकता होती है, लेकिन एक सहयोगी समाज और एक ‘गिरोह’ में बड़ा अंतर है। एक स्वस्थ समुदाय वह है जहाँ लोग अपने अनुभव साझा करते हैं, एक-दूसरे के विकास में मदद करते हैं और व्यक्ति की निजता व स्वतंत्रता का सम्मान करते हैं। इसके विपरीत, गिरोह पूर्ण अधीनता और एकरूपता की मांग करता है।
अत: जीवन में स्थायी सुख और शांति किसी बाहरी संस्था या गिरोह की सदस्यता में नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर के अन्वेषण में है। जब व्यक्ति सामाजिक और धार्मिक गुटों की पूर्व-निर्धारित और संकीर्ण शर्तों से मुक्त होता है, तभी वह मानवीय व्यवहार, प्रकृति और जीवन के यथार्थ को स्पष्ट रूप से देख पाता है। अपनी चेतना और अपने निर्णयों का मालिक स्वयं बनना ही शांति का सबसे बड़ा और अंतिम रहस्य है।
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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