शरीर के सुख से बड़ा सुख कोई नहीं है, यह सभी सुखों की उत्पत्ति का आधार है ! इसलिए सबसे पहले इस शरीर के सुख की चिंता करो, यही जीवन में सुखी होने का रहस्य है ।
शारीरिक सुख और आराम केवल एक विलासिता नहीं है, बल्कि यह हमारे मस्तिष्क के सुचारू रूप से काम करने की जैविक आवश्यकता है।
जब हम शरीर को सुख देते हैं, जैसे- अच्छा भोजन, गहरी नींद, शारीरिक व्यायाम या विश्राम, तो न्यूरोकेमिकल रिवॉर्ड सिस्टम सही तरह से काम करता है ! मस्तिष्क में सभी हार्मोन जैसे डोपामाइन, सेरोटोनिन, एंडोर्फिन और ऑक्सीटोसिन जैसे रसायनों का स्राव सही अनुपात में सहज होता है। यही सुख की अनुभूति का आधार है !
सुख की अनुभूति वास्तव में इन्हीं रसायनों का खेल है। यदि शरीर कष्ट में है, तो मस्तिष्क इन ‘फील गुड’ रसायनों का स्राव रोक देता है। और दुःख, चिंता, परेशानी के हार्मोन रिलीज करता है ! जो शरीर में तरह तरह के रोगों का कारण बनता है !
यदि शरीर में दर्द, थकान या कोई असुविधा है, तो रेटिकुलर एक्टिवेटिंग सिस्टम तुरंत अलार्म बजा देता है और हमारा सारा ध्यान उच्च स्तरीय विचार जैसे- ध्यान, योजना, सृजन से हटाकर सीधे शरीर की पीड़ा पर केंद्रित हो जाता है। इसलिए, जब तक शरीर सुखी और स्थिर नहीं है, मस्तिष्क किसी और सकारात्मक दिशा में एकाग्र ही नहीं सकता है।
जब शरीर सुख और सुरक्षित अवस्था में होता है, तो हमारा ‘पैरासिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम’ सक्रिय होता है। जो हमारे विकास में पहली प्राथमिकता है ! इसके विपरीत, शारीरिक कष्ट में ‘सिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम’ सक्रिय हो जाता है, जिससे कॉर्टिसोल जैसे विकास विरोधी स्ट्रेस हार्मोन बढ़ते हैं, जो शरीर और मन दोनों को भीतर से खोखला कर देते हैं।
वास्तव में मन और शरीर अलग-अलग नहीं हैं, बल्कि एक-दूसरे का विस्तार हैं। शरीर के सुख से ही मानसिक शांति की उत्पत्ति होती है।
हमारे विचार और भावनाएं ही पूरी तरह से हमारी शारीरिक स्थिति से आकार लेती हैं। एक थका हुआ, भूखा या बीमार शरीर कभी भी सकारात्मक, नेतृत्व-क्षमता वाले या ऊर्जावान विचारों को जन्म नहीं दे सकता। शारीरिक सुख से मानसिक आत्मविश्वास और इच्छाशक्ति का सीधा संबंध है।
अर्थात शरीर को सुख देने का अर्थ है, शरीर की ऊर्जा का संरक्षण करना। जब शरीर अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष नहीं कर रहा होता है, तब वह अपनी बची हुई ऊर्जा का उपयोग व्यक्ति के व्यक्तिगत विकास, नेतृत्व क्षमता और बड़े लक्ष्यों के निर्माण में करता है।
इसलिये ईश्वर के वरदान स्वरूप दिये हुये इस स्वस्थ्य शरीर को किसी भी प्रपंच में पड़ कर नष्ट मत करो ! यदि आत्मविकास चाहिये, तो सबसे पहले अपने शरीर को सुखी रखो ! यही प्रकृति की व्यवस्था है !!
