भगवान शिव को ‘आदियोगी’, ‘महादेव’ और ‘वैरागी’ कहा जाता है। जो साधक गहरे स्तर पर भगवान शिव की साधना करता है, उसका चित्त शिव के स्वरूप में ढलने लगता है। तब साधक चित्त की वृत्तियों को निरुद्ध कर मन के भटकाव और विकारों को शांत कर लेता है।
एक सच्चे शिव साधक के भीतर से निम्नलिखित वृत्तिगत दोष स्वतः ही छूट जाते हैं :-
भगवान शिव ‘महाकाल’ और ‘महामृत्युंजय’ हैं। जो उनका ध्यान करता है, उसके भीतर से मृत्यु का भय हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है। साधक यह समझ जाता है कि शरीर नश्वर है और आत्मा अनंत है। इसके साथ ही भविष्य को लेकर हर तरह की असुरक्षा की भावना भी मिट जाती है।
शिव एक परम वैरागी हैं, जिनका निवास श्मशान है और आभूषण भस्म व रुद्राक्ष हैं। उनके साधक में भी ‘वैराग्य’ स्वतः फलित होने लगता है। सांसारिक वस्तुओं, धन, और पद के प्रति अंधी दौड़ और मोह (आसक्ति) छूटने लगती है। व्यक्ति अपनी जिम्मेदारियां निभाता है, लेकिन उनके प्रति आसक्त या गुलाम नहीं रहता।
भगवान शिव ‘पशुपति’ हैं। वे देवताओं, दानवों, यक्षों, गंधर्वों, भूत-पिशाचों और जीव-जंतुओं—सभी के नाथ हैं। शिव साधक के भीतर से उच्च-नीच, अमीर-गरीब, या रूप-रंग का भेदभाव पूरी तरह मिट जाता है। उसके भीतर ‘समभाव’ (सबको समान दृष्टि से देखना) जाग्रत हो जाता है।
शिव का एक नाम ‘भोलेनाथ’ है। वे अत्यंत सरल और सहज हैं। उनकी साधना करने वाले व्यक्ति के मन से सांसारिक चालाकी, षड्यंत्र रचने की प्रवृत्ति, और कपट छूट जाता है। साधक का स्वभाव बच्चे की तरह निर्मल, स्पष्ट और सीधा हो जाता है।
भगवान शिव पूरे ब्रह्मांड के स्वामी होकर भी बैल (नंदी) की सवारी करते हैं और सबसे साधारण अवस्था में रहते हैं। जो शिव को जान लेता है, उसका ‘मैं’ (अहंकार) नष्ट हो जाता है। उसे अपनी विद्या, धन या शक्ति का कोई घमंड नहीं रहता क्योंकि वह जान लेता है कि सब कुछ उसी परम सत्ता का है।
शिव ध्यान की परम गहराई और स्थिरता के प्रतीक हैं। उनके साधक का चित्त हिमालय की तरह शांत और स्थिर हो जाता है। छोटी-छोटी बातों पर परेशान होना, उतावलापन, और मन का लगातार बड़बड़ाना बंद हो जाता है। उद्वेग की जगह एक गहरी ‘ठहराव’ ले लेती है।
यद्यपि शिव का ‘रुद्र’ रूप विनाशकारी है, लेकिन वह क्रोध अज्ञान और अधर्म के नाश के लिए है, व्यक्तिगत अहंकार के लिए नहीं। शिव साधक व्यक्तिगत अपमान या छोटी बातों पर प्रतिक्रिया देना (React करना) छोड़ देता है। वह क्षमाशील हो जाता है और केवल वहीं अपनी ऊर्जा लगाता है जहाँ धर्म या न्याय की आवश्यकता हो।
संक्षेप में शिव की साधना व्यक्ति को उसके मूल स्वरूप से मिलाती है। साधक के भीतर से सभी अशुद्धियां समाप्त हो जाती हैं और वह “शिवोहम” अर्थात मैं ही शिव हूँ , मैं ही शिव की तरह शुद्ध चैतन्य हूँ यह अनुभूत करते हुये, जीवन में शांति और आनंद को प्राप्त कर लेता है।
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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