वैष्णव षडयंत्रकारियों ने अपने दान दक्षिणा के स्वार्थ में समाज की बहुत बड़ी ऊर्जा कर्मकाण्ड में लगा कर हिन्दूओं का सर्वनाश कर दिया है !
जबकि भगवान शिव ‘शिव स्वरोदय’ में स्वयं माता पार्वती से कहते हैं :-
आत्मैव देवता प्रोक्ता आत्मैव परमं पदम्।
आत्मैव परमं ज्ञानं आत्मैव परमेश्वरः ॥
अर्थ:
स्वयं की आत्मा ही वास्तविक देवता है, अपनी आत्मा ही ‘परम पद’ है। स्वयं की आत्मा ही ‘परम ज्ञान’ है और अपनी आत्मा ही परमेश्वर (शिव तत्व) है।
अर्थात भगवान को किसी कर्मकाण्ड के माध्यम से कहीं बाहर मत तलाशो ! अपने आत्मा से ही संवाद स्थापित करो ! यही मुक्ति का एक मात्र मार्ग है !
माता पार्वती ने शिव को प्राप्त करने के लिए राजकुमारी होते हुये भी किसी राजसी वैभव या सांसारिक समर्थ का आश्रय नहीं लिया था, और न ही कोई धार्मिक कर्मकाण्ड किया था, बल्कि उन्होंने एकांत वन में जाकर आत्मशोधन द्वारा शिव के योग्य बनने के लिये अपनी इंद्रियों पर पूर्ण विजय प्राप्त करने के लिये ‘इंद्रिय जय तप’ किया था !
और इस ‘इंद्रिय जय तप’ से जाग्रत कठोर स्वावलंबन की ऊर्जा से वह शक्ति जागृत की, जिसके आगे शिव को भी वैराग्य छोड़ कर गृहस्थ में प्रवेश करना पड़ा !!
शिव ग्रंथ स्पष्ट घोषणा करते हैं कि तुम्हारे भीतर बैठा विवेक ही साक्षात शिव है। जब आप अपनी आंतरिक ऊर्जा पर पूर्ण विश्वास करके आत्मनिर्भर बनते हैं, तभी आप संसार के बंधनों को छिन्न-भिन्न कर पाते हैं। तब ही आपका शिवत्व जागृत होता है और आप स्वयं में शिव बन जाते हैं ! इसी को ‘शिवोऽहम्’ जाग्रत अवस्था कहते हैं !
और इसके लिये किसी कर्मकाण्ड की आवश्यकता नहीं है !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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