गुरुदेव सभी को शैव ग्राम क्यों नहीं बुलाते हैं

शैव जीवन शैली भगवान शिव के आडम्बर विहीन, अपरिग्रह अर्थात न्यूनतम आवश्यकता में जीवन निर्वाह करना, प्रकृति से प्रेम मात्र ही नहीं उसका नि:स्वार्थ संरक्षण और पोषण भी करना, निरंतर आत्म-सुधार, विवेकपूर्ण आत्म अनुशासन, दूसरे के प्रति सेवा, सहयोग का भाव और पूर्ण आत्मनिर्भरता का आदर्श जीवन दर्शन है ! सुनने में यह सब बहुत सहज, शांतिपूर्ण और व्यवहारिक प्रतीत होता है।

लेकिन आज के आधुनिक चमक दमक, बाजारीकरण, आडम्बर युक्त जीवन शैली में इस तरह जीना किसी तपस्या से कम नहीं है। शैव ग्राम की यात्रा केवल एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने का विषय नहीं है, बल्कि सदियों से चली आ रही आदतों और मानसिक जड़ताओं को जड़ मूल से बदलने को प्रक्रिया है।

आज जोमेटो और बिलिंकेट के युग में हमें ‘रेडीमेड’ जीवन शैली की लत लग चुकी है, यह मानसिक कल्पना ही नहीं है कि गाजर, आलू बोने के बाद तीन महीने प्रतीक्षा संरक्षण और सेवा भी करनी पड़ती है ! उसमें समय समय पर गोबर की जैविक खाद भी डालनी पड़ती है, तब सब्जी मिलती है !

बाजार में सब कुछ पैसे से मिलता है, किन्तु शैव ग्राम में खेती के अतिरिक्त सौर ऊर्जा प्रबंधन या प्राकृतिक जल शोधन, प्राकृतिक निवास आदि की व्यवस्था स्वयं ही करनी पड़ती है ! जिसमें नदी पर जाकर खुले में नहाने से लेकर लकड़ी तोड़ने, कंडे, गोबर गैस पर भोजन बनाना आदि सभी कुछ शामिल है !

यहाँ कोई बैंक बैलेंस, ब्रांडेड कपड़ों, कारें या पद की अकड़ नहीं है ! एक साधारण संन्यासियों जैसा आत्मनिर्भर जीवन जीना पड़ता है ! डिजिटल स्क्रीन, सोशल मीडिया भी ‘डोपामाइन’ बढ़ाने के लिये नहीं है !

बहुत साहस चाहिये इस निर्णय के लिये कि “अगर मैं मुख्यधारा से कट गया, तो मैं संसार की निगाह में पीछे भी खुश ही हूँ” ! यह ‘फियर ऑफ मिसिंग आउट’ का मनोवैज्ञानिक भय बहुतों को आजीवन भर अवसाद में ले जा सकता है। इसलिये शैव जीवन शैली को सांसारिक पहलुओं से समझे बिना यहाँ आना व्यर्थ है !

यहाँ आपको मनोवैज्ञानिक सहारा देने के लिये ‘कोई भगवान नहीं है’ ! यह आत्मशोधन, ‘वैराग्य’, ‘इंद्रिय जय तप’  और ‘समत्व’ (सुख-दुख में समान रहना) को प्राप्त करने का साधना स्थल है।

शैव ग्राम अहंकार के विपरीत जीने की कला है, क्योंकि आपके सभी कार्मिक सम्बन्ध, सुख दुःख, मिलना बिछुड़ना, सफलता असफलता यह सब आपके अहंकार का ही प्रगट स्वरूप है ! जिन्हें आपको स्वयं ही साधना द्वारा नष्ट करना है !

जो निरंतर अभ्यास से इस मन:स्थिती को बर्दास्त कर सकता है, उसी का शैव ग्राम में स्वागत है, शेष को लम्बी तैय्यारी की जरुरत है !

इस तैय्यारी के बिना शैव ग्राम आना बस सिर्फ तनाव लेकर वापस जाना है ! इसीलिये गुरुदेव शैव ग्राम बुलाने के पहले साधक को तैय्यार करते हैं ! आप भी गुरुदेव के मार्गदर्शन में स्वयं को तैय्यार कर सकते हैं ! वह भी मात्र गुरुदेव के डिजिटल क्लास से जुड़ कर !!

शिवम् शुक्ला

शैव ग्राम, राजस्थान, भारत 

Share your love
yogeshmishralaw
yogeshmishralaw
Articles: 2515

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *