भगवान शिव और भगवान विष्णु को धूर्त वैष्णव ठीक वैसे ही एक परम सत्ता के दो रूप बतलाते हैं, जैसे मुस्लमान भगवान और अल्लाह को एक ही बताते हैं और इसाई जीसस और कृष्ण को एक बतलाते हैं !
लेकिन वैष्णव की कार्य शैली शैवों के एकदम विपरीत होती है। भगवान विष्णु के उपासक वैष्णव कभी भी कूटनीति और छल करने में कोई संकोच नहीं करते हैं ! इसीलिये समाज में वैष्णव प्राय: धूर्त और बेईमान कहे जाते हैं ।
इसके विपरीत, भगवान शिव ‘भोलेनाथ’ हैं। वह निश्छल, वैरागी और सीधे सादे हैं। उनका चरित्र विष्णु की राजनीतिक और छद्म रणनीतियों के एकदम विपरीत है। विष्णु का हर मानव अवतार अविश्वसनीय, छली और प्रपंच रहा है !
विष्णु और शिव की कार्यप्रणाली एक-दूसरे के एकदम विपरीत है। भगवान शिव वैरागी हैं, वह मोह-माया से दूर, सीधे और निश्छल भोले हैं।
इसके विपरीत, भगवान विष्णु सृष्टि अर्थात संसार को चलाने, धर्म की रक्षा के नाम पर ‘साम, दाम, दंड, भेद’ (कूटनीति, माया और छल) का प्रयोग करते हैं। वैष्णव परंपरा में इसे महिमामंडित करते हुये इस धूर्त मक्कारी को ‘छल’ या ‘प्रपंच’ नहीं, बल्कि धर्म की स्थापना के लिए रची गई ‘लीला’ या ‘माया’ कहा जाता है। जिसमें वैष्णव ने अपने साम्राज्य विस्तार के लिये गैर वैष्णव के लाशों के ढेर लगा दिये हैं !
विष्णु ने अपने हर प्रमुख अवतारों में माया, कूटनीति और छल से काम लिया है ! जैसे :-
समुद्र मंथन के समय अमृत कलश चुराने के लिये विष्णु ने लहंगा चुनरी पहन कर चोरी की ! राजा बलि को छलने के लिये ब्राह्मण बालक का रूप रख कर छला, जिसे वामन अवतार कहा गया !
राम ने अपने स्वार्थ के लिये बलि को धोखे से मारा और लक्ष्मण से मेघनाथ को पूजा करते समय मरवा दिया ! जबकि उसी मेघनाथ के पिता रावण ने शत्रुता के बाद भी राम का त्रिलोक विजय अनुष्ठान रामेश्वरम में ईमानदारी से सफलता पूर्वक करवाया था और कोई दक्षिणा भी नहीं ली थी !
कृष्ण ने सबसे अधिक बेईमान थे, कई बार छल और नियमों को तोड़ा था ! फिर वह चाहे भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, कर्ण, जयद्रथ, दुर्योधन कोई हो इन योद्धाओं को छल से ही मारा था ! वह भी धर्मयुद्ध के नाम पर पांडु के जुआड़ी और नाजायज औलादों को सत्ता वापस दिलाने के लिये तपस्वियों की हत्या करवा दी !!
फिर भी धूर्त वैष्णव कहते हैं, शिव और विष्णु एक ही हैं !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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