प्रश्न : – किसी जिज्ञासु ने जानना चाहा है कि शैव ग्राम में साधकों के लिये भोजन किस जाति बिरादरी वाले लोग बनाते हैं !
मेरा उत्तर :- शैव जीवन दर्शन सामाजिक समानता पर आधारित जीवन शैली है। इस मत में सामाजिक वर्ण या जाति व्यवस्था (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) का कोई स्थान नहीं है। यहाँ मनुष्य की केवल एक ही सर्वोच्च पहचान होती है: ‘शिव भक्त’ होना ।
भगवान शिव स्वयं भावातीत परम तपस्वी और वैरागी हैं, उन्होंने सभी को स्वीकारा है, उनके आशीर्वाद के लिए सभी ने उनकी तपस्या की है, और आशीर्वाद लिया है !
फिर वह चाहे देवता, दैत्य, दानव, यक्ष, किन्नर, भूत-प्रेत, पिशाच, जिन्न, बेताल, चंडाल, किसी भी प्रजाति या योनि के हों, उन्होंने सर्वस्व को स्वीकारा है, उनके लिये सभी एक समान हैं।
जो भक्त उनकी इस समदृष्टि (सबको समान देखने की भावना) का अनुकरण करता है, उसके अन्दर सांसारिक और जातिगत अहंकार स्वतः नष्ट हो जाता है।
शैव परंपरा मानती है कि हर जीव में शिव का ही अंश है (“शिवोहम”)। अतः जन्म या कर्म के आधार पर ऊंच-नीच का भेदभाव अज्ञानता है। एक सच्चा शैव इन सभी सामाजिक बंधनों से मुक्त होकर केवल भक्ति, प्रेम और समभाव के मार्ग पर चलता है।
इसलिये उस जिज्ञासु का यह प्रश्न ही शैव ग्राम में निष्प्रयोग है कि शैव ग्राम में साधकों के लिये भोजन किस जाति बिरादरी वाले लोग बनाते हैं !
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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