यदि आप तनिक रुक कर अपनी दिनचर्या को अपने अस्तित्व से जोड़कर देखिये, तो आप पायेंगे कि आपका “मस्तिष्क” सामाजिक डेटा और अल्गोरिदम से प्रायोजित है !
धर्म, व्यवस्था और आस्था के नाम पर आपके रचनाकारों ने आपको अपने उद्देश्य के लिए तैय्यार किया है। जिसने आपके भीतर की स्वतंत्र आत्म-चेतना को अपना गुलाम बना लिया है।
आज आप किसी अन्य के लिये पढ़ते हैं, जागते हैं, खाते हैं, भागते हैं, और जिसे अपना काम समझ रहे हैं ! वह स्थिति अज्ञात भ्रम का सबसे बड़ा उदहारण है।
फिर भी आज का व्यक्ति यह सोचकर जीवन बिता देता है कि वह स्वतंत्र निर्णय ले रहा है, जबकि वास्तव में उसकी इच्छाएं, उसकी दिनचर्या, और यहाँ तक कि उसके विचार भी किसी अन्य बाहरी कारकों द्वारा “प्रायोजित” हैं !
जो मनुष्य की अपनी स्वाभाविक जैविक लय के विरुद्ध है, मनुष्य का यह जिया जाने वाला जीवन कृतिम और अप्राकृतिक है। इसीलिये मनुष्य को सब कुछ पा लेने के बाद भी संतुष्टि नहीं मिलती है, क्योंकि वह जी ही किसी अन्य की संतुष्टि के लिये रहा है, स्वयं के लिये तो वह कभी जिया ही नहीं ! यही जीने का तरीका गलत है !
इस अचेतन अवस्था के प्रति सजगता ही मुक्ति है। जब व्यक्ति तार्किक चिंतन और ‘इंद्रिय जय तप’ के माध्यम से अपने मस्तिष्क को इस बाहरी नियंत्रण और अंधी दौड़ को हटा लेता है, तब वह अपने जन्म के उद्देश्य को स्पष्ट देख पाता है। यही अपनी चेतना के इसी शुद्धिकरण और स्वयं के वास्तविक स्वरूप में स्थित हो जाने का नाम ही सच्चा मोक्ष है।
जिस अवस्था को शैव ‘प्रज्ञा बोध साधना’ से प्राप्त करते हैं ! यही शैवों का मोक्ष है !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
शैव ज्ञान के लिये संस्थान की कक्षा से जुड़िये
मोबाईल : 9453092553
