शक्तिपात महाविज्ञान सनातन परंपरा का एक अत्यंत रहस्यमयी और प्रभावशाली अंग है। सरल शब्दों में, शक्तिपात का अर्थ है—”गुरु द्वारा शिष्य के भीतर आध्यात्मिक ऊर्जा (कुंडलिनी शक्ति) का संचार करना।”
यह साधना मार्ग का एक ऐसा शॉर्टकट है जहाँ साधक को अपनी मेहनत से शक्ति जागृत नहीं करनी पड़ती, बल्कि समर्थ गुरु की कृपा और समर्थ से वह स्वतः साधना में सक्रिय हो जाता है।
इसी तरह देव शक्तिपात किसी मानवीय कर्म, यज्ञ, तप या बौद्धिक योग्यता के अधीन नहीं है। यह पूरी तरह से शिव की ‘स्वातंत्र्य शक्ति’ (इच्छा) पर निर्भर करता है। शिव जब जीव पर अनुग्रह करना चाहते हैं, तो उनकी शक्ति शिव से संचरित होती है।
इसके लिए कोई विशेष दिन या मुहूर्त अनिवार्य नहीं है, क्योंकि यह शिव की कृपा से देव ऊर्जाओं की आंतरिक प्रेरणा पर निर्भर करता है।
जब साधक का अंतःकरण (मन और बुद्धि) पर्याप्त रूप से शुद्ध हो जाता है और उसमें तीव्र वैराग्य या ईश्वर को पाने की प्रबल इच्छा होती है, यही देव शक्तिपात का सही समय होता है।
देव शक्तिपात कोई जादुई तमाशा नहीं है, बल्कि यह आध्यात्मिक साधना की गति को तेज करने का एक दिव्य माध्यम है। एक सुपात्र साधक वही है, जो देव शक्तिपात प्राप्त करने के बाद नियमित साधना, सदाचार और संयम के द्वारा उस मिली हुई देव ऊर्जा को बनाये रखे और आगे बढ़ता रहे।
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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