सामान्यतः आध्यात्मिक जगत में ‘आत्मज्ञान’ को जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य और मोक्ष का द्वार माना जाता है। हर साधक इसी की प्राप्ति के लिए जप, तप और ध्यान करता है।
लेकिन एक अत्यंत गूढ़ और व्यावहारिक दृष्टिकोण यह भी है कि यदि आप जिम्मेदारियों से भागने वाले व्यक्ति हैं, तो आपको आत्मज्ञान से बचना चाहिए। आत्मज्ञान कोई व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह एक बहुत बड़ा ईश्वरीय दायित्व है, जो अपने साथ कड़ी शर्तें लेकर आता है।
आत्मज्ञान केवल पोथियां पढ़ने या जंगलों में एकांत वास करने से नहीं मिलता; यह पूर्णतः ईश्वरीय कृपा का प्रसाद है। जब ईश्वर किसी जीव पर प्रसन्न होते हैं, तभी उसके अज्ञान के पर्दे हटते हैं और उसे सत्य का बोध होता है।
किंतु, ईश्वर यह अमूल्य ज्ञान इसलिए नहीं देता कि व्यक्ति उसे तिजोरी में बंद करके किसी हिमालय की गुफा में शांति से बैठ जाए। ईश्वरीय व्यवस्था में ज्ञान का उद्देश्य केवल एक व्यक्ति का उद्धार नहीं है, बल्कि पूरे समाज का मार्गदर्शन है।
जब ईश्वर आपको अज्ञान के अंधकार से बाहर निकालता है, तो वह यह अपेक्षा करता है कि आप एक दीपक की भांति समाज में फैलें और दूसरों का भी मार्ग प्रशस्त करें।
समस्या तब उत्पन्न होती है जब व्यक्ति का निजी स्वभाव इस ईश्वरीय अपेक्षा से टकराता है। कई बार व्यक्ति आत्मज्ञान केवल इसलिए चाहता है ताकि वह संसार के दुखों, झंझटों और जिम्मेदारियों से मुक्त हो सके। ज्ञान प्राप्ति के बाद वह एकांतप्रिय हो जाता है और समाज के कल्याण के लिए कोई कार्य नहीं करना चाहता।
वह सोचता है कि उसने अपना लक्ष्य पा लिया है और अब उसे दुनिया से कोई लेना-देना नहीं है। यहीं पर व्यक्ति सबसे बड़ी भूल करता है। आत्मज्ञान को निजी संपत्ति मान लेना और उसे समाज की भलाई (लोक कल्याण) में न लगाना, ईश्वरीय विधान के विरुद्ध है।
प्रकृति और ईश्वर का नियम संतुलन पर आधारित है। जो ज्ञान आपको समाज के उत्थान के लिए दिया गया था, यदि आप अपने आलस्य, वैराग्य के अहंकार या निजी स्वभाव के कारण उसे समाज में नहीं बांटते हैं, तो ईश्वर इसे दायित्व से भागना मानता है।
ऐसे में, जिस मोक्ष या जन्म-मरण के चक्र से छूटने के लिए आपने आत्मज्ञान प्राप्त किया था, वह आपको नहीं मिलता। इसके विपरीत, ईश्वर आपको ‘दंड स्वरूप’ बार-बार इस पृथ्वी पर भेजता है। यह पुनर्जन्म किसी सामान्य जीव की तरह नहीं होता, बल्कि यह एक कठोर ईश्वरीय आदेश के साथ होता है कि जब तक आप लोक-कल्याण का अपना अधूरा कार्य पूरा नहीं कर लेते, तब तक आपकी अंतिम मुक्ति संभव नहीं है।
इस पूरी ईश्वरीय व्यवस्था का सार यह है कि आत्म-कल्याण का मार्ग लोक-कल्याण की पगडंडी से होकर ही गुजरता है। यदि आप यह सोचते हैं कि आप समाज को उसके हाल पर छोड़कर अकेले मोक्ष पा लेंगे, तो यह आपकी भूल है।
यदि आपके भीतर सच में आत्म-कल्याण की इच्छा है, तो यह मानसिक रूप से स्वीकार करके चलिए कि आपको लोक-कल्याण करना ही पड़ेगा। यही सृष्टि का नियम है और यही ईश्वरीय न्याय है। इसलिए, यदि आप संसार के प्रति करुणा और सेवा का भाव नहीं रख सकते, तो बेहतर है कि आत्मज्ञान की मांग ही न करें, क्योंकि इसके साथ आने वाली जिम्मेदारी अत्यंत भारी होती है।
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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