अपने ही जीवन काल में मत मरो

मनुष्य केवल श्वास लेने और भौतिक सुख-सुविधाएं भोगने के लिये पैदा नहीं हुआ है। जो व्यक्ति केवल अपने वर्तमान और व्यक्तिगत स्वार्थ तक सिमट कर रह जाता है, उसका वैचारिक और आध्यात्मिक अस्तित्व उसके जीवित रहते ही समाप्त हो जाता है।

इसी संदर्भ में यह कहा गया है कि भावी पीढ़ियों के लिए कार्य न करने वाले की मृत्यु उसके जीवन काल में ही हो जाती है, क्योंकि वह अपने जीवनकाल में शारीरिक रूप से भले ही जीवित हो, लेकिन मानवीय चेतना के स्तर पर वह मृतप्राय हो चुका होता है।

सच्चा जीवन निरंतरता और सृजन का प्रतीक है। प्रकृति का हर तत्व, नदियां, वृक्ष, सूर्य—भविष्य के पोषण के लिए निस्वार्थ भाव से कार्य करते हैं।

इसी तरह जब मनुष्य आने वाली पीढ़ियों के लिए कोई सकारात्मक वैचारिक, सामाजिक या पर्यावरणीय विरासत नहीं छोड़ता, तो वह सृष्टि के इस प्राकृतिक प्रवाह से कट जाता है। आत्म-केंद्रित जीवन जीने वाले व्यक्ति की संवेदनाएं और दृष्टि इतनी संकुचित हो जाती हैं कि उसके भीतर का ‘मनुष्य’ मर जाता है।

आज हम जिस स्वतंत्रता, ज्ञान, तकनीकी विकास और सुरक्षित समाज का उपभोग कर रहे हैं, वह हमारे पूर्वजों के त्याग और दूरदर्शिता का ही परिणाम है। यदि उन्होंने केवल अपने वर्तमान की चिंता की होती, तो मानव सभ्यता का विकास वहीं रुक जाता। समाज में उसी व्यक्ति को वास्तव में ‘जीवित’ माना जाता है, जो ऐसे पेड़ लगाता है जिसकी छांव में वह खुद कभी नहीं बैठेगा।

इसलिए, भावी पीढ़ियों के लिए कार्य करना कोई विकल्प नहीं, बल्कि हमारे जीवन को सार्थकता प्रदान करने की शर्त है। जो व्यक्ति आने वाले कल के लिए एक बेहतर दुनिया गढ़ने का प्रयास करता है, वह मृत्यु के बाद भी अपने कर्मों के माध्यम से अमर रहता है।

इसके विपरीत, केवल अपने लिए जीने वाला व्यक्ति अपनी चेतना, सामाजिक उपादेयता और इतिहास की स्मृतियों में अपने जीवन काल में ही मिट जाता है।

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

कुण्डली परामर्श हेतु सम्पर्क कीजिये

मोबाईल : 9453092553

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