अधिवक्ता को देवतों का सेनापति क्यों कहते हैं

यह पूरी दुनियां जब आपका शोषण कर रही होती है, आपको डरा रही होती है, उस समय आपका कोई साथ नहीं दे रहा होता है, तब अधिवक्ता ही है जो आपके अधिकारों की रक्षा के लिये अपना मान स्वाभिमान जीवन सब कुछ दांव पर लगा देता है !

आज देश में अधिवक्ता की भूमिका और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह आज नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिये खड़ा हुआ है !

किसी भी जीवंत और स्वस्थ लोकतंत्र की सबसे बड़ी पहचान यह है कि वहां सत्ता का स्वरूप निरंकुश न हो। जब भी किसी देश में सरकार या कार्यपालिका के भीतर अहंकार या तानाशाही की प्रवृत्ति जन्म लेती है, तो उसे रोकने का सबसे मजबूत संवैधानिक हथियार न्यायपालिका और देश का अधिवक्ता वर्ग होता है।

भारत के परिप्रेक्ष्य में यह कथन पूर्णतः सत्य है कि जब तक राष्ट्र और संविधान के प्रति समर्पित अधिवक्ता मौजूद हैं, तब तक किसी भी सत्ता की मनमानी और तानाशाही लंबी नहीं चल सकती।

भारतीय संविधान ने देश के हर नागरिक को कुछ मौलिक अधिकार दिए हैं। लेकिन इन अधिकारों का कोई अर्थ नहीं रह जाता यदि इन्हें लागू करवाने वाली कोई मजबूत व्यवस्था न हो। अधिवक्ता न्यायालयों के माध्यम से यह सुनिश्चित करते हैं कि विधायिका या कार्यपालिका द्वारा लिया गया कोई भी निर्णय संविधान की मूल भावना के खिलाफ न हो।

जब भी कोई असंवैधानिक या मनमाना कदम उठाया जाता है, तो देश के सजग अधिवक्ता जनहित याचिकाओं के माध्यम से उसे सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालयों में चुनौती देते हैं। बंदी प्रत्यक्षीकरण जैसे कानूनी अधिकारों का उपयोग कर वे यह सुनिश्चित करते हैं कि राज्य अपनी पुलिस या एजेंसियों का दुरुपयोग कर किसी निर्दोष की स्वतंत्रता न छीने।

लोकतंत्र में सरकार को मनमानी करने से रोकने के लिए एक स्वतंत्र न्याय प्रणाली आवश्यक है, और इस प्रणाली की रीढ़ इसके अधिवक्ता होते हैं। समर्पित अधिवक्ता बिना किसी डर या दबाव के सरकार के खिलाफ मुकदमों की पैरवी करते हैं। उनका यह निडर रुख इस बात को स्थापित करता है कि देश में “कानून का शासन” सर्वोपरि है और कानून से ऊपर कोई नहीं है, चाहे वह कितने भी प्रचंड बहुमत वाली सरकार क्यों न हो। एक अधिवक्ता का काम केवल अपने मुवक्किल को बचाना नहीं है, बल्कि वह न्याय की प्रक्रिया का एक अहम हिस्सा है जो व्यवस्था को पटरी से उतरने नहीं देता।

एक मजबूत, निडर और स्वतंत्र कानूनी बिरादरी किसी भी देश में सत्ता के एकाधिकार को रोकने का एक प्राकृतिक अवरोध है। वकालत का पेशा केवल जीविकोपार्जन का साधन नहीं है, बल्कि यह न्याय की रक्षा का एक पवित्र दायित्व है। यह एक निर्विवाद सत्य है कि जब तक देश की अदालतों में संविधान के प्रति निष्ठावान और सत्य के लिए लड़ने वाले अधिवक्ता अपनी आवाज बुलंद करते रहेंगे, तब तक भारत के लोकतांत्रिक मूल्य और नागरिकों की स्वतंत्रता को कोई भी अहंकारी सत्ता कुचल नहीं सकती है ।

योगेश कुमार मिश्र

पूर्व पैनल अधिवक्ता,

भारत सरकार

सर्वोच्च न्यायालय

मोबाईल : 9453092553

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