आपदा में उदय की ग्रह व्यवस्था

जिस प्रकार सघन अंधकार ही भोर के प्रथम प्रकाश को जन्म देता है, उसी प्रकार मनुष्य की विपदाएं और उसकी कमजोरियां ही उसके वास्तविक उदय का मार्ग प्रशस्त करती हैं।

वैदिक ज्योतिष में जन्म कुण्डली के छठे, आठवें और बारहवें भाव को प्रायः अशुभ या दुख का कारक माना जाता है। छठा भाव रोग और ऋण का, आठवां भाव मृत्यु और अचानक आने वाली विपदाओं का, और बारहवां भाव हानि तथा अलगाव का प्रतिनिधित्व करता है।

सामान्य दृष्टि से देखने पर यह भाव मनुष्य की कमजोरियों और उसके जीवन के सबसे अंधकारमय क्षणों को दर्शाते हैं। किंतु, एक स्वतंत्र विचारक और ज्ञानी की दृष्टि में यही भाव मनुष्य के जीवन को पूर्णतः रूपांतरित करने वाली सबसे बड़ी शक्ति भी हैं।

कमजोरी वास्तव में क्या है? आधुनिक उपभोक्तावादी समाज में यदि कोई व्यक्ति धन एकत्रित नहीं कर पाता, या पारंपरिक शिक्षा प्रणाली की रटने वाली दौड़ में पीछे रह जाता है, तो उसे कमजोर मान लिया जाता है। किंतु यथार्थ में, यह उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि इस कृत्रिम व्यवस्था के प्रति उसकी चेतना का स्वाभाविक विद्रोह है।

आठवां भाव, जिसे विपदा का भाव कहा जाता है, वह गहन शोध, आत्म-मंथन और पूर्ण कायाकल्प का भी भाव है। जब जीवन में अचानक कोई बड़ा संकट आता है, तो वह मनुष्य के भीतर छिपी हुई उस अदम्य ऊर्जा को जाग्रत कर देता है, जो सामान्य परिस्थितियों में कभी बाहर नहीं आ पाती।

सच्चा पुरुषार्थ इसी में है कि हम अपनी कमजोरियों या अपनी विपत्तियों को अपनी पराजय न मानें, बल्कि उन्हें अपने उदय की सीढ़ी बना लें। जब आप बाज़ार की दौड़ में हारते हैं, तो वह हार आपको यह अवसर देती है कि आप शून्य लागत वाली प्राकृतिक जीवनशैली को अपनाएं। जब आप आभासी संबंधों से निराश होते हैं, तो वह निराशा आपको सीधे और वास्तविक संवाद की ओर ले जाती है।

ग्रहों का काम आपको डराना नहीं है, बल्कि यह बताना है कि जिस क्षेत्र में आप सबसे अधिक संघर्ष कर रहे हैं, वहीं आपके जीवन की सबसे बड़ी सफलता का बीज भी छिपा हुआ है। बस आवश्यकता है तो उस बीज को सही मिट्टी और पुरुषार्थ के जल से सींचने की है।

आपदा में प्राकृतिक ऊर्जा से सहयोग के लिये आपको यह उपाये अवश्य करने चाहिये !

अपनी कुंठा और अपनी कमजोरियों पर विलाप करने के बजाय, उस ऊर्जा को भूमि के नव-सृजन में लगाएं। किसी विस्तृत भूभाग पर जाकर शून्य लागत के प्राकृतिक जीवन की नींव रखें। अपने हाथों से मिट्टी और गारे को गूंथ कर आवास बनाएं और 50 से अधिक प्रजातियों के फलदार वृक्षों का सघन वन तैयार करें।

जब आप बंजर भूमि को एक हरे-भरे पक्षी विहार और प्राकृतिक वन में बदलते हैं, तो भूमि के साथ-साथ आपके भीतर की सारी कुंठाएं और कमजोरियां भी एक नई ताकत के रूप में अंकुरित होने लगती हैं।

दूसरा यदि आपको लगता है कि आप समाज से कटे हुए हैं या संचार में कमजोर हैं, तो आभासी संचार माध्यमों के भ्रामक जाल को तुरंत त्याग दें। इसके स्थान पर, युवाओं के लिए आवासीय प्रशिक्षण जैसी व्यवस्थाओं का निर्माण करें। उनके साथ आमने-सामने बैठकर सीधा और स्पष्ट संवाद करें। उन्हें स्वावलंबन और पुरुषार्थ का प्रायोगिक ज्ञान दें।

जब आप दूसरों का मार्गदर्शन करते हैं, तो आपकी अपनी वैचारिक कमजोरियां स्वतः ही एक प्रखर और अजेय बुद्धि में बदल जाती हैं।

तीसरा शारीरिक या मानसिक दुर्बलता को दूर करने के लिए बाज़ार की कृत्रिम औषधियों पर निर्भर न रहें। अपने शरीर को सूती, खादी या लिनन जैसे प्राकृतिक वस्त्रों से ढकें। नित्य आहार में अपरिष्कृत (बिना पॉलिश वाले) चावल, तरोई, लौकी, मूंग की दाल और शुद्ध देशी घी को सम्मिलित करें।

यह पूर्णतः प्राकृतिक और सात्विक आहार शरीर की दुर्बलताओं को समाप्त कर स्नायु तंत्र को असीम बल प्रदान करता है, जिससे मन किसी भी विकट परिस्थिति का सामना करने के लिए तैयार हो जाता है।

मनुष्य का जीवन कोई ऐसा सीधा मार्ग नहीं है जिसमें कोई बाधा न हो। बाधाएं, विपदाएं और कमजोरियां प्रकृति द्वारा दी गई वह कसौटी हैं, जिन पर कसकर ही मनुष्य का व्यक्तित्व कुंदन की भांति निखरता है। यह अध्याय इस महान सत्य की उद्घोषणा करता है कि विपदा से घबराना कायरता है, और उस विपदा की छाती पर पैर रखकर अपना नया उदय करना ही सच्चा पुरुषार्थ है।

जब हम अपनी कमजोरियों को बाज़ार के चश्मे से देखना बंद कर देते हैं और उन्हें प्रकृति के বৃহত্তর (व्यापक) परिप्रेक्ष्य में समझते हैं, तब हमें ज्ञात होता है कि कोई भी ग्रह हमें दंडित नहीं कर रहा। वे तो मात्र हमें हमारी कृत्रिम जीवनशैली से निकालकर एक राज-ऋषि के मार्ग पर ले जाने का प्रयास कर रहे हैं।

जिस क्षण मनुष्य स्वयं पर निर्भर होना सीख लेता है, शून्य लागत के सिद्धांतों पर अपना जीवन गढ़ लेता है, उसी क्षण उसकी हर कमजोरी उसके जीवन का सबसे बड़ा अस्त्र बन जाती है। स्वयं को पहचानना और अपनी कमियों को अपने ही पुरुषार्थ की वेदी पर चढ़ाकर एक नए और स्वावलंबी जीवन का सृजन करना ही ज्योतिष विज्ञान का परम लक्ष्य है।

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

कुण्डली परामर्श हेतु सम्पर्क कीजिये

मोबाईल : 9453092553

गुरुदेव योगेश कुमार मिश्र की फोटो और नाम के साथ 1280 × 1000 पिक्सेल में कम से कम शब्दों में एक चित्र बनाइये जिसमें गुरुदेव हरा चमकदार कुर्ता सफ़ेद पैजामा पहने हैं गले में लाल पट्टा डाले है उसमें सफ़ेद रंग से ॐ नम: शिवाय लिखा है, वह मंच पर खड़े होकर अपने शैव ग्राम के सभागार में बहुत से शिष्यों को प्रवचन दे रहे हैं ! हाल पूरा भरा हुआ है ! ऊपर से स्पेस देते हुये बड़े शब्दों में हेडिंग रहेगी ‘आपदा में उदय की ग्रह व्यवस्था’ फोटो में गुरुदेव का एक ही चित्र प्रयोग कीजिये नाम के साथ कोई फोटो मत लगिए ! फोटो में उचित स्थान पर एक गोले के अन्दर लिखिये ज्योतिष श्रंखला – 10  संपर्क 9453092553

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