शैव ग्राम केवल 10 एकड़ का भूखंड या आवासीय प्रकल्प नहीं है; यह पिण्ड (मानव देह) और ब्रह्मांडीय लय के पूर्ण एकाकार का एक जीवंत ‘पारिस्थिकीय तीर्थ’ है। आधुनिक समाज कृत्रिम जीवनशैली, वैचारिक विषाक्तता और स्नायविक ताप से जल रहा है।
ऐसे में शैव ग्राम एक ऐसी प्राकृतिक प्रयोगशाला है जहाँ कृत्रिम तरंगों का प्रवेश वर्जित है। यहाँ मियावाकी पद्धति से विकसित सघन वन, देशी बीजों का रोपण और शून्य-बजट प्राकृतिक जीवन केवल कृषि नहीं, बल्कि विशुद्ध ‘संस्कार चिकित्सा’ हैं।
जब साधक यहाँ की सात्विक मिट्टी में मौन रहकर श्रम करता है, तो उसका देहाभिमान, अकारण आवेग और बौद्धिक अहंकार स्वतः गलने लगता है। इस तीर्थ में कोई कर्मकांड नहीं है; यहाँ प्रकृति स्वयं गुरु है।
‘नीलकंठ मनोविज्ञान’ के माध्यम से यहाँ संघर्षों को विशुद्ध साक्षी भाव से देखना सिखाया जाता है। जब कृत्रिम कोलाहल शांत होता है, तब ‘ब्रह्मास्मि क्रिया योग’ द्वारा आभामंडल में भटकी प्राण-ऊर्जा सुषुम्ना नाड़ी में स्थापित हो जाती है। यहाँ के पंचमहाभूत स्नायुतंत्र के समस्त खगोलीय ताप को सोख लेते हैं।
साधारण तीर्थों में मनुष्य ईश्वर से कुछ मांगने जाता है, परंतु शैव ग्राम में वह अपनी महत्वाकांक्षाओं को प्रकृति के चरणों में विसर्जित कर पूर्णतः रिक्त होने आता है।
जब चेतना अपने मूल पारिस्थिकीय केंद्र में लौटती है, तो सारा बाहरी संघर्ष शून्य हो जाता है। शैव ग्राम इसी महा-शून्यता का वह सर्वोच्च तीर्थ है, जहाँ पिण्ड और ब्रह्मांड का भेद मिट जाता है और मनुष्य की श्वासें ब्रह्मांड के असीम नाद के साथ सदा के लिए एक हो जाती हैं।
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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