जब मस्तिष्क लगातार यह योजना बनाता है कि “यदि मैं ऐसा करूँगा, तो यह काम आज हो जाएगा।” लेकिन जब बाहरी व्यवस्था (जैसे कोई सरकारी अधिकारी या नियम) आपकी योजना के अनुसार नहीं चलती, तो मस्तिष्क को अपनी ही बनाई गई उम्मीदों से बार-बार टकराना पड़ता है।
उस दीवार को धकेलने में शरीर की नहीं, बल्कि मन की पूरी ऊर्जा खर्च हो जाती है। जब हम उस दिशा में बल लगाते हैं जहाँ हमारा कोई अधिकार नहीं है, तो तीव्र मानसिक थकान उत्पन्न होती है।
जब व्यक्ति बार-बार कागजी कार्यवाही या व्यवस्था को सुधारने का प्रयास करता है और हर बार उसे देरी या अस्वीकृति मिलती है, तो मनोविज्ञान के अनुसार मस्तिष्क ‘सीखी गई विवशता’ की अवस्था में चला जाता है। मन यह मान लेता है कि “मेरे कुछ भी करने से कोई अंतर नहीं पड़ेगा।” यह निराशावादी सोच मन को भीतर से तोड़ देती है।
मानसिक थकान जब अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाती है, तो मस्तिष्क स्वयं को और अधिक आहत होने या तनाव से बचाने के लिए एक रक्षा तंत्र अपनाता है। वह भावनाओं और संवेदनाओं को बंद कर देता है। यही वह अवस्था है जिसे हम ‘शून्यता’ कहते हैं। इसमें न तो क्रोध आता है, न ही दुख होता है, बल्कि भीतर एक गहरी उदासीनता और रिक्तता छा जाती है।
इससे बाहर आने के लिए हमें अपनी विचार प्रक्रिया और कर्म की दिशा में मूल चूल परिवर्तन की आवश्यकता है !
सबसे पहले अपने वृत्ति को पहचानिये और कल्पना कीजिये कि उस वृत्त के भीतर वह सब है जिस पर आपका पूरा अधिकार है, जैसे आपके अपने दस्तावेज सही तैयार करना, समय पर कार्यालय पहुँचना, आपका धैर्य और आपका व्यवहार।
वृत्त के बाहर वह सब है जिस पर आपका कोई अधिकार नहीं है, कर्मचारी की मानसिकता, सरकारी नियम, छुट्टियों के दिन या कार्य की गति। अपनी पूरी मानसिक ऊर्जा केवल उस वृत्त के भीतर केंद्रित करें जहाँ आपका अधिकार है। जो बाहर है, उसके विषय में सोचना तत्काल बंद कर दें।
दूसरा पूर्ण स्वीकृति का अभ्यास निरंतर कीजिये, यह स्वीकार कर लें कि बाहरी व्यवस्था की प्रकृति धीमी और जटिल है। जब हम वास्तविकता को अस्वीकार करते हैं और यह सोचते हैं कि “ऐसा नहीं होना चाहिए” या “इसे जल्दी होना चाहिए”, तभी संघर्ष उत्पन्न होता है। व्यवस्था जैसी है, उसे उसी रूप में बिना किसी शिकायत के स्वीकार कर लेने से मन का आधा बोझ तुरंत उतर जाता है।
तीसरा बस अपना कर्म करें, परिणाम से वैराग्य लें मतलब अपने प्रयास को केवल एक ‘कार्य’ के रूप में देखें, अपने जीवन के अंतिम लक्ष्य के रूप में नहीं। अपना काम पूरी निष्ठा से करें, कागजी कार्यवाही पूरी करें, लेकिन मन को उस पत्रावली (दस्तावेज) के साथ कार्यालय में न छोड़ें। वापस आकर अपना ध्यान उन कार्यों में लगाएँ जो आपके नियंत्रण में हैं, जैसे प्रकृति के बीच समय बिताना, मिट्टी और पौधों के साथ काम करना, या स्वाध्याय और लेखन करना। रचनात्मक कार्य शून्यता को भरते हैं।
और अन्त में साक्षी भाव अर्थात तटस्थता भाव का विकास कीजिये ! ब्रह्मास्मि क्रिया योग या ध्यान की गहरी समझ यहाँ बहुत उपयोगी है। जब भी व्यवस्था के कारण देरी हो, तो भीतर उठने वाली झुंझलाहट या क्रोध को केवल एक दर्शक की भाँति देखें। उस क्रोध में बहें नहीं।
स्वयं से कहें कि “यह बाहरी व्यवस्था की त्रुटि है, यह मेरी त्रुटि नहीं है।” इस प्रकार आप स्वयं को उस परिस्थिति से अलग कर लेते हैं। तब हम जीवन में मानसिक थकान और शून्यता से बाहर निकल पाते हैं !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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