“सुबह जल्दी उठने” को सफलता की एकमात्र कुंजी के रूप में महिमामंडित किया गया है। 5 बजे उठने वाले क्लबों ने और मोटिवेशनल स्पीकर्स ने एक षडयंत्र के तहत हमारे दिमाग में यह बात बैठा दी है कि जो सोता है, वो खोता है। लेकिन क्या यह पूरी तरह सच है?
जल्दी उठना केवल एक ‘समय’ है, जबकि उद्देश्य वह ‘ईंधन’ है, जो उस समय को सार्थक बनाता है। बिना ईंधन के गाड़ी स्टार्ट करके छोड़ देने से केवल इंजन (शरीर और दिमाग) खराब ही होता है।
इसलिए, अगर आपके पास सुबह उठकर करने के लिए कोई सार्थक उद्देश्य नहीं है, तो अलार्म बंद करें और तब तक सोएं जब तक आपका शरीर प्राकृतिक रूप से उठने की मांग न करे।
अनावश्यक देर तक सोना निश्चित रूप से आपके सर्कैडियन रिदम को बिगाड़ता है और शारीरिक सुस्ती लाता है। लेकिन इसे सुधारना अपेक्षाकृत आसान है।
किन्तु इसके विपरीत, उद्देश्यहीन होकर सुबह जल्दी उठना सीधे आपके मानसिक स्वास्थ्य पर हमला करता है। यह आपके शरीर के स्ट्रेस हॉर्मोन्स को ट्रिगर करता है और मोटिवेशन हॉर्मोन्स को मार देता है।
शारीरिक रूप से, सुबह उठते ही शरीर में ‘कोर्टिसोल’ (तनाव हार्मोन) बढ़ता है। लक्ष्य न होने पर यह ऊर्जा खर्च नहीं होती और चिंता या घबराहट पैदा करती है। वहीं, प्रेरणा देने वाले ‘डोपामाइन’ और मूड सुधारने वाले ‘सेरोटोनिन’ का स्तर गिर जाता है, जिससे दिन भर भयंकर आलस और उदासी बनी रहती है।
मनोवैज्ञानिक स्तर पर, खाली दिमाग नकारात्मक विचारों (रुमिनेशन) का शिकार हो जाता है, जो डिप्रेशन का कारण बन सकता है। इसके अलावा, जल्दी उठकर भी कुछ प्रोडक्टिव न कर पाने से मन में एक गहरा अपराधबोध (गिल्ट) पैदा होता है, जो आत्मसम्मान को बुरी तरह गिराता है।
इसलिये यह जान लीजिये, जल्दी उठना केवल ‘समय’ है और उद्देश्य उसका ‘ईंधन’। बिना ईंधन के शरीर और दिमाग को चालू रखने से नुकसान ही होगा। इसलिए, उद्देश्यहीन जागने से बेहतर अपनी पूरी नींद से थोड़ा अधिक सोना !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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