कब्ज की मूल वजह
सच यह है कि पारंपरिक सनातन गेहूं के पौधे काफी लंबे (लगभग 4 से 5 फीट) होते थे। इस ऊंचाई के कारण तेज हवा या बारिश में पौधे अक्सर गिर जाते थे, जिससे फसल बर्बाद हो जाती थी।
अमेरिकी में इस तरह के आंधी तूफान बहुत आते हैं, तब अमेरिकी कृषि वैज्ञानिक डॉ. नॉर्मन बोरलॉग ने गेहूं की एक बौनी और अधिक उपज देने वाली किस्म विकसित की। जिसमें उन्होंने जापानी ‘नोरिन 10’ को मेक्सिको के विशेष नश्ल से क्रास करवाया !
जिसके बदले उन्हें 1970 में नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
बाद में अमेरिका की बीज बेचने वाली कंपनियों ने पूरी दुनियां में इस बौने गेहूँ की मार्केटिंग करके उन्हें ऊँची कीमत पर बेचना शुरू किया, जिससे हमारे परंपरागत गेहूँ के स्थान पर भारत में भी कृतिम भुखमरी को रोकने के नाम पर हरित क्रांति कह कर इसे सरकारी दबाव बना कर भारत में बेचा ! जिसके लिये लाल बहादुर शास्त्री जैसे नेता की हत्या भी 11 जनवरी 1966 करवा दी ! इसके बाद भारत में हरित क्रांति बड़े स्तर पर लागू हुई !
इस घातक गेहूं में ‘ग्लूटेन’ नामक चिपचिपा प्रोटीन होता है। जिन लोगों को सीलिएक रोग या ग्लूटेन से एलर्जी होती है, उनका इम्यून सिस्टम गेहूं खाने पर उनकी आंतों में सूजन और घाव आ जाती है। जिससे वह स्थाई रूप से गंभीर कब्ज के मरीज हो जाते हैं ! यह मधुमेह और मोटापा का भी कारण है ! शरीर में सूजन और जोड़ों का दर्द अदृश्य सूजन के कारण गठिया, वात रोग, और मांसपेशियों में दर्द जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं।
पेट फूलना, गैस, कब्ज और आंतों की पुरानी सूजन के साथ ‘फाइटिक एसिड’ की मात्रा इस प्रकार होती है कि यह शरीर में लौह तत्व (आयरन), जस्ता (जिंक) और कैल्शियम जैसे आवश्यक खनिजों के अवशोषण को रोक देता है, जिससे शरीर में खून की कमी और हड्डियों की कमजोरी पनपती है और व्यक्ति हजार रोगों के साथ इस दुनियां को छोड़ देते हैं !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ एवं शैव ग्राम
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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