धार्मिक व्यक्ति क्यों अधिक अपराधी होता है

धार्मिक आवरण और आपराधिक प्रवृत्तियों के बीच का अंतर्विरोध मूलतः मानव मन की जटिलताओं और जीवन के प्रति उसके दार्शनिक दृष्टिकोण के पतन का परिणाम है। जब कोई व्यक्ति धर्म का पालन करते हुए भी अपराध की ओर प्रवृत्त होता है, तो यह धर्म की विफलता नहीं, बल्कि उसके व्यक्तिगत मनोवैज्ञानिक आघातों और स्वार्थ-प्रेरित दर्शन का चरमरा जाना है। इसे दर्शन और मनोविज्ञान के गहरे सूत्रों के माध्यम से समझा जा सकता है।

दार्शनिक स्तर पर, पतन तब शुरू होता है जब व्यक्ति धर्म को आत्म-शोधन या चेतना के विस्तार का मार्ग न मानकर इच्छा-पूर्ति का एक वैधानिक अनुबंध मान लेता है। वास्तविक दर्शन निष्काम कर्म और सच्चे ‘पुरुषार्थ’ की मांग करता है, जहां व्यक्ति अपनी चेतना को ऊपर उठाने और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने के लिए संघर्ष करता है। लेकिन जब धर्म केवल एक सौदा बन जाता है कि अनुष्ठानों के बदले ईश्वर भौतिक सफलता, सत्ता या धन देगा तो लालसाएं कभी शांत नहीं होतीं।

जब यह तथाकथित अनुबंध टूटता है और असीमित लालसाएं पूरी नहीं होती हैं, तो व्यक्ति का दार्शनिक ढांचा ढह जाता है। वह यह मान लेता है कि यदि नैतिक या धार्मिक मार्ग से उसकी इच्छाएं पूरी नहीं हुईं, तो अनैतिक मार्ग अपनाना उसका अधिकार है। समाज में धार्मिक वेशभूषा उसे एक प्रकार का ‘फर्स्ट-मूवर एडवांटेज’ देती है, जिससे वह लोगों का सहज विश्वास जीतकर बिना किसी संदेह के अपने स्वार्थ सिद्ध करने लगता है। यह धर्म का मुखौटा है, सच्चा दर्शन नहीं।

मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह विरोधाभास और भी गहरा है। समाज में जिसे हम अक्सर एक ‘सामान्य’ व्यवहार मान लेते हैं, वह दरअसल कई बार गहरे अनसुलझे आघातों और कुंठाओं का आवरण होता है। जब किसी व्यक्ति का स्नायु तंत्र बचपन के आघातों, असुरक्षाओं या हीन भावना के कारण भीतर से अत्यधिक अशांत होता है, तो वह शक्ति और सुरक्षा की तलाश में धर्म की शरण लेता है। लेकिन यदि वह अपने भीतर के अंधकार का सामना नहीं करता, तो धर्म केवल एक मानसिक दर्द-निवारक बनकर रह जाता है।

लालसा पूरी न होने पर यही दबा हुआ मानसिक विक्षोभ विस्फोट का रूप ले लेता है। यहाँ ‘संज्ञानात्मक असंगति’ की भूमिका बहुत अहम हो जाती है। व्यक्ति का मस्तिष्क एक ही समय में स्वयं को अत्यधिक पवित्र भी मानता है और अनैतिक कार्य भी करता है। वह आत्म-छल के माध्यम से स्वयं को समझाता है कि उसके द्वारा किए गए बड़े-बड़े धार्मिक अनुष्ठान उसे कुछ अपराध करने की नैतिक छूट देते हैं।

जब व्यक्ति का मस्तिष्क एक संकुचित और कठोर ढांचे में काम करता है, जहां वह समग्रता में सोचने के बजाय केवल अपने फायदे-नुकसान के पैटर्न में फंसा रहता है, तो हताशा उसे उग्र बना देती है। जब ईश्वर या समाज से उसकी उम्मीदें टूटती हैं, तो यह मोहभंग एक प्रकार का नकारात्मक मनोवैज्ञानिक प्रभाव पैदा करता है। उसकी सारी दबी हुई आक्रामकता, जो अब तक धार्मिक अनुष्ठानों के नीचे केवल छिपी हुई थी, प्रतिशोध या अपराध के रूप में बाहर आ जाती है।

बाहरी आचरण और आंतरिक चेतना के बीच का यह विशाल फासला ही एक धार्मिक व्यक्ति को अपराधी बनाता है। जब तक आध्यात्मिकता का उपयोग स्नायु तंत्र को संतुलित करने, अपने आघातों को ठीक करने और निस्वार्थ जीवन जीने के लिए नहीं किया जाता, तब तक धर्म केवल बेलगाम इच्छाओं और अपराधों को ढंकने का एक सुविधाजनक, लेकिन बेहद खतरनाक, पर्दा बना रहेगा।

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

कुण्डली परामर्श हेतु सम्पर्क कीजिये

मोबाईल : 9453092553

Share your love
yogeshmishralaw
yogeshmishralaw
Articles: 2577

Newsletter Updates

Enter your email address below and subscribe to our newsletter

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *